Friday, February 27, 2026

पहली होली मायके में ही क्यों? जानिए शादी के बाद की खास परंपरा

शादी के बाद पहली होली लड़की ससुराल में क्यों नहीं मनाती है? 
भारतीय पारंपरिक संस्कृति में शादी के बाद बहू की पहली होली मायके में मनाने की प्रथा सदियों पुरानी है. यह परंपरा सिर्फ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि प्रेम, अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव का सुंदर प्रतीक है. इसके पीछे कई सामाजिक और धार्मिक कारण माने गए हैं.

1. नए रिश्तों में सहजता लाने का समय

शादी के तुरंत बाद लड़की एक नए घर, नए लोगों और नए माहौल में जाती है.
होली जैसे रंगों और शोरगुल वाले त्योहार के दौरान उसे असहजता महसूस न हो, इसलिए यह माना गया कि पहली होली वह अपने मायके में, अपने परिवार और बचपन के वातावरण में मनाए.
इससे उसे भावनात्मक स्थिरता मिलती है और नए रिश्तों में ढलने के लिए समय मिलता है.

2. बेटी को मायके में सम्मान और प्यार देने की परंपरा
भारतीय संस्कृति में बेटी हमेशा अपने मायके के लिए प्रिय मानी जाती है.
शादी के बाद पहली होली पर उसे मायके बुलाना प्यार, सम्मान और अधिकार देने का तरीका है.
यह संकेत है कि शादी के बाद भी लड़की का मायके पर पूरा हक है.

3. ससुराल के प्रति शुभ संकेत

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, बहू का मायके जाकर पहली होली मनाना ससुराल और मायके, दोनों परिवारों को शुभता और समृद्धि देता है.
माना जाता है कि मायके से खुश होकर आने वाली बहू ससुराल में सुख और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आती है.

4. परंपरा से जुड़ी भावनात्मक वजहें

होली रंगों, मस्ती और परिवार के साथ समय बिताने का त्योहार है. नई दुल्हन को माता-पिता से मिलकर भावनात्मक सहयोग मिलता है. यह उसके लिए एक तरह से emotional recharge का काम करता है.

5. सामाजिक दृष्टि से सुरक्षा का कारण

पुराने समय में होली पर माहौल अनियंत्रित, रंगों और पानी का अधिक उपयोग और सफर लंबा होता था.
नई दुल्हन को ससुराल में रंग खेलने की झिझक भी रहती थी.
इसलिए परिवार उसे सुरक्षित माहौल, मायके, में भेजते थे.

6. रीति-रिवाज़ों की निरंतरता

कई राज्यों में, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, यह परंपरा आज भी निभाई जाती है. इसे शगुन माना जाता है.
पहली होली के मायके से बहू जब वापस आती है तो ससुराल में उसे उपहार, आशीर्वाद और पूर्ण सम्मान मिलता है.
शादी के बाद पहली होली मायके में मनाना सिर्फ रीति नहीं, बल्कि प्यार, सुरक्षा, सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का सुंदर प्रतीक है.
यह परंपरा दोनों परिवारों के रिश्तों में मिठास बढ़ाने और बहू को सहजता देने का माध्यम है.

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