इस साल की शुरुआत बिहार में शराबबंदी की नीति (Bihar liquor policy) पर बवाल से शुरु हुई थी. बीजेपी ने छपरा जहरीली शराब कांड के बाद मुख्यमंत्री पर शराबबंदी की नीति की समीक्षा के लिए बड़ा दबाव बनाया लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज़ी नहीं हुए. छपरा में जहरीली शराब पीने से 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. सरकार विपक्ष के निशाने पर थी लेकिन सीएम एकदम कड़क. नीतीश कुमार ने साफ कहा कि “शराब पीकर और भी राज्यों में लोग मर रहे हैं. शराब पीना ग़लत है. हम तो कह रहे हैं जो पिएगा, वो मरेगा. दारू पीकर मरने वालों को हम कोई मुआवजा देंगे इसका सवाल ही नहीं उठता.” इसके साथ ही सीएम ने कहा कि इस क़ानून से राज्य की महिलाएं काफ़ी खुश हैं. सीएम के इस दावे की बिहार रुरल लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जीविका), चाणक्य विधि विश्वविद्यालय और पंचायती राज द्वारा संयुक्त रूप से कराए गए सर्वे में पुष्टी भी हो गई है.
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बिहार में 96% लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया है-सर्वे
बिहार सरकार ने शराबबंदी कानून (Bihar liquor policy) को लेकर एक सर्वे कराया था.उस सर्वे की रिपोर्ट आ गई है. इससे पहले की हम सर्वे के नतीजों पर बात करें, ये जान ले कि सर्वे में कौन-कौन लोग शामिल हुए. तो सरकार के इस सर्वे के बारे में बताया जा रहा है कि इसके लिए 10 लाख से ज्यादा लोगों से संपर्क किया गया. सर्वेक्षण के लिए सभी जिलों और सभी प्रखंडों को आधार बनाया गया. इसके लिए जीविका समूह से 10 हजार दीदियों को प्रशिक्षित किया गया. सर्वे के लिए ये दीदियां 7968 पंचायतों में गई.
मद्य निषेध उत्पाद विभाग द्वारा तैयार प्रश्नों के सेट के आधार पर 10 लाख 22 हजार से अधिक लोगों से सवाल पूछे गए. सेंपल साइज से तो सर्वे के साइज़ का आपको अंदाज़ा हो गया होगा. अब इसके नतीज़ों को भी जान लीजिए. सर्वे में खुलासा हुआ है कि राज्य की 99 प्रतिशत महिला आबादी और 92 प्रतिशत पुरूष आबादी शराबबंदी के पक्ष में है. सर्वे का कहना है कि 2016 में शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक 1 करोड़ 82 लाख यानी करीब 96 प्रतिशत लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया है. यानी सर्वे की माने तो बिहार तकरीबन-तकरीबन शराब मुक्त राज्य बन गया है. जहां शराब बिक्री ही बंद नहीं हुई है बल्कि लोग भी शराब पीना छोड़ चुके है. मतलब समाज में शराब को लेकर एक आदर्श स्थिति पैदा हो गई है.
सर्वे के आकड़ों के जवाब में आबकारी विभाग के आकड़े अलग कहानी बयां करते हैं
सर्वे रिपोर्ट के रिजल्ट को सुनकर किसी की भी हंसी छूट जाएगी. सरकारी संस्थान की मदद से तैयार ये सर्वे रिपोर्ट बिलकुल सरकारी है. दरअसल बिहार की सच्चाई जानने वाला कोई भी इस सर्वे रिपोर्ट से सहमत नहीं हो सकता है. सरकार के आकड़ों पर सवाल उठाने के लिए हमारे पास भी आकड़ों की ताकत है. सरकार की रिपोर्ट की जांच के लिए हमने सरकार के ही मद्य या आबकारी विभाग से कुछ आकड़ों की मांग की. आबकारी आयुक्त बिहार बी. कार्तिकेय ने हमें बताया कि जबसे, यानी 1 अप्रैल 2016 से लेकर दिसंबर 2022 तक, 700 से ज्यादा लोगों की मौतें नकली शराब पीने से हुई है. अब तक शराब पीने से लेकर शराब की तस्करी, बनाने, बेचने के मामलों में साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए हैं. आबकारी विभाग ने करीब 53 लाख लीटर अवैध शराब जब्त की है. इसके अलावा अवैध शराब के कारोबार में शामिल 80 हज़ार से ज़्यादा गाड़ियों को भी ज़ब्त किया गया है.
अब सवाल ये उठता है कि अगर राज्य में अब तक 1.82 करोड़ यानी करीब 96 प्रतिशत लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया है तो आखिरी ये कौन लोग है जो शराब की राज्य में तस्करी कर रहे है ?
2022 में छपरा,औरंगाबाद और 2021 में गोपालगंज, सिवान और चंपारण में कौन लोग थे जो शराब पीकर मर गए. शराब की होम डिलीवरी को लेकर जो रोज़ रोज़ खबरें आती रहती है, वो कौन लोग है जो घर में शराब तो मंगा रहे है लेकिन पीते नहीं है?
इतना ही नहीं हर महीने राज्य के किसी न किसी जिले से आबकारी विभाग की टीम पर शराब माफिया के हमले की जो खबरें आती है उसमें कौन लोग शामिल होते है?
शराबबंदी के सर्वे और शराबबंदी की मांग करने वालों में क्या है समानता ?
सवाल कई है लेकिन उनके जवाब जानने से पहले शराब बंदी कानून (Bihar liquor policy) बनाने को लेकर एक किस्सा सुन लीजिए. शायद सर्वे के आकड़ों को लेकर आपके कुछ सवालों के जवाब खुद ब खुद आपको मिल जाए. बात जुलाई 2015 की है. विधानसभा चुनावों सर पर थे. नीतीश कुमार बिहार की राजधानी पटना में महिलाओं के स्वयं-सहायता समूह ‘जीविका’ के कार्यक्रम में पहुंचे हुए थे.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे ही अपना भाषण समाप्त कर मंच से उतर रहे थे, वहां बैठी ‘जीविका दीदियों’ ने उन्हें घेर लिया. मुख्यमंत्री को इन दीदियों ने राज्य में फैल रही शराब की लत की जानकारी दी और शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की.
वैसे तो इस स्वयं-सहायता समूह की महिलाएं लंबे समय से शराबबंदी की मांग कर रहे थी लेकिन उस दिन जब उन्होंने सीधा मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखी तो सीएम ने मौके पर चौका मारते हुए वापस मंच का रुख किया और मंच से मुस्कुराते हुए घोषणा कर दी कि वो अगर सत्ता में वापस लौटे तो राज्य में शराबबंदी लागू कर देंगे.
2015 में महागठबंधन की जीत के बाद नीतीश कुमार ने यह वादा निभाया और राज्य में शराबबंदी की घोषणा कर दी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश के बाद बिहार में शराब पर प्रतिबंध बिहार निषेध एवं आबकारी अधिनियम के तहत लागू किया गया जो 1 अप्रैल 2016 से शुरू हुआ.
यानी सर्वे करने वाली ये दीदियां ही इस नीति (Bihar liquor policy) के बनने की वजह थी. खैर शराबबंदी ज़रुर इन दीदियों की मांग से हुई हो लेकर बिहार सरकार को हर साल होने वाले 4,000 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व का नुक़सान नीतीश कुमार सरकार को होता है. बावजूद इसके नीतीश कुमार कभी इस नीति की समीक्षा के लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने शराबबंदी से राजस्व घाटे पर हमेशा कहा कि “सामाजिक नुक़सान इससे भी कहीं बढ़कर है. हम अन्य माध्यमों से घाटे की भरपाई करेंगे.” यानी जो सर्वे बोल रहा है वो शायद पूरा सच न भी हो लेकिन नीतीश कुमार का शराबबंदी के फायदों को लेकर विश्वास हमेशा से पक्का रहा.
विपक्ष ने बदला शराबबंदी की नीति को लेकर रुख
पहले तो विपक्ष यानी बीजेपी भी इन फायदों में विश्वास करती थी जनवरी 2017 में खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी तारीफ करते हुए कहा था कि
“नशा मुक्ति का जिस प्रकार से नीतीश कुमार ने अभियान चलाया है,आने वाली पीढ़ियों को बचाने के लिए उन्होंने जो बीड़ा उठाया है, मैं उनका बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं बधाई देता हूं.”
लेकिन सत्ता के साथी बदलने के साथ ही बीजेपी के विचार भी बदल गए. 15 दिसंबर 2022 को बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुशील मोदी ने कहा, “हमने साथ दिया है आज भी हम साथ हैं और शराबबंदी (Bihar liquor policy) के पक्ष में हैं लेकिन इस तरह की शराबबंदी जिसमें लाखों लोगों को जेल जाना पड़े और पूरा राज्य पुलिस राज्य में बदल जाए, उसकी समीक्षा तो मुख्यमंत्री जी को करनी ही चाहिए.”
कानून को बेहतर तरह से लागू करने उसकी समीक्षा जरूरी है
लेकिन शायद नए सर्वें के बाद वो ऐसी मांग न करें. हलांकि समीक्षा तो हर कानून की होती रहनी चाहिए और शराबबंदी (Bihar liquor policy) को लेकर तो कई गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं. जैसे शराब तो प्रदेश में बिक रही है लेकिन राजस्व का पैसा अब पुलिस और शराब माफियाओं की जेब में जा रहा है. इसके साथ ही कहा जा रहा है कि शराबबंदी को पुलिस ने गरीब तबके के खिलाफ दमन और उगाही का हथियार बना लिया है. इतना ही नहीं मुख्यमंत्री का जो दावा था कि शराबबंदी से राज्य में अपराध कम हुए है, वो भी गलत ही साबित हो रहा है. यहां तक कि महिलाओं के खिलाफ भी अपराध साल-दर साल बढ़ रहे हैं. ऐसे में सरकार का ये सर्वे विपक्ष का मुंह बंद करने के लिए तो अच्छा है लेकिन अगर महिलाओं के साथ साथ शराबबंदी (Bihar liquor policy) का फायदा पुरुषों तक भी पहुंचा है तो कानून के साथ-साथ उसको सही लागू करने पर भी जोर देना होगा. तभी शराबबंदी आगे भी चुनावों में फायदा पहुंचाती रहेगी और सिर्फ महिलाओं में ही नहीं पुरुषों में भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दबदबा बना रहेगा. वरना आकड़ों की जादूगरी से आंखों में धूल तो झोंक सकती है लेकिन हकीकत को बदल नहीं सकती.

