Friday, July 3, 2026
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रोहिंग्या नागरिकों पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी- क्या उनके लिए लाल कालीन बिछाये ?

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Supreme Court On Rohingya
Supreme Court On Rohingya

Supreme Court On Rohingya :  सीमापर से आये रोहिंग्या नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ी टिप्पणी दी है.  शीर्ष अदालत में मंगलवार को पांच लापता रोहिंग्या नागरिकों का पता लगाने की मांग लेकर एक याचिका सुनवाई के लिए आई,जिसपर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की कोर्ट ने कड़े और महत्वपूर्ण सवाल उठाए गये. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि –‘ क्या उन नागरिकों के लिए हमें लाल कालीन बिछाना चाहिए?’  इस सुनवाई के दौरान हलांकि शीर्ष अदालत ने सीमा की संवेदनशीलता पर भी अपनी चिंता जाहिर की.

Supreme Court On Rohingya : अवैध तरीके से आए लोगों को रखना हमारा दायित्व है ?

सुनवाई के  दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि उत्तर भारत की सीमाएं बहुत संवेदनशील हैं. यहां लोग सुरंगों के रास्ते से अंदर आ जाते हैं, फिर आश्रय, भोजन और शिक्षा का अधिकार मांगते हैं.क्या कानून को इतना खींचना चाहिए? सीजेआई ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या हमारे बच्चों को इन सुविधाओं की जरुरत नहीं हैं?

क्या हमारे देश में रोहिंग्याओं को शरणार्थी का दर्जा प्राप्त है ?

सीजेआई ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या हमारे देश में ऐसा कोई आधिकारिक आदेश है, जिसमें रोहिंग्या समुदाय से आने वाले लोगों के ‘शरणार्थी’ का दर्जा दिया गया हो  और  अगर इन्हें कानूनी दर्जा नहीं मिला हुआ है तो क्या अवैध तरीके से घुसे हुए किसी व्यक्ति को रखना क्या हमारा दायित्व है?

‘क्या उनके लिए हम लाल कालीन लगायें ?’

सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि अगर उन्हें (रोहिंग्या) कोई कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं और वे एक घुसपैठिए हैं, तो क्या हम उनका स्वागत लाल कालीन (Red Carpet) पर करेंगे ?

मुख्य न्यायाधीश के रुख को देखते हुए मामले के याचिकाकर्ता वकील ने कहा कि वे किसी अवैध नागरिक के निर्वासन का विरोध नहीं कर रहे हैं लेकिन कस्टडी से गायब होने की आशंका के कारण सुप्रीम कोर्ट आए हैं.  CJI ने कहा कि हेबियस कॉरपस जैसी मांगें बहुत कल्पनात्मक लगती हैं.

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 हैवियस कॉर्पस याचिका क्या होती है ?

आपको बता दें कि भारतीय न्याय व्यवस्था में हैवियस कॉरपस याचिका तब दाखिल की जाती है, जब किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया गया हो . इस कानून के तहत याचिकाकर्ता हिरासत में लिये गये व्यक्ति को अदालत में पेश करने का आदेश मांगती है ताकि हिरासत की वैधता की जाँच की जा सके. यह याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायलय के द्वारा प्रदान  की जा सकती है.

मामले की अगली सुनावई 16 दिसंबर को 

सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित  याचिका को 16 दिसंबर तक के लिए टाल दिया है.इस दिन सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्याओं से जुड़े दूसरे मामले सुनवाई के लिए लगे हुए हैं.