नई दिल्ली। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया पर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच एनडीए के तीन प्रमुख सहयोगी दलों—लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी)—ने चुनाव आयोग से सीधे जनता के सामने आकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। इन दलों का मानना है कि आम जनता के मन में चुनावी प्रणाली को लेकर पैदा हुए भ्रम और अविश्वास को दूर करना बेहद आवश्यक है।
चुनावी प्रक्रिया और जनता का भरोसा: चिराग पासवान का बयान
केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने पटना में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि सरकार का हिस्सा होने के नाते उनका उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था का आंख मूंदकर बचाव करना नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग के कामकाज और निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे आयोग का पक्ष मजबूती से रखें और जनता के संशय को दूर करें।
चिराग ने आगे कहा कि विपक्ष का काम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप करना हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती के लिए आम नागरिकों का चुनावी प्रणाली पर भरोसा होना सबसे जरूरी है। यदि लोगों का इस व्यवस्था से विश्वास उठने लगा, तो यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए कतई ठीक नहीं होगा। इसलिए आयोग को राजनीतिक बयानों के बजाय सीधे देश की जनता के सामने आकर स्थिति साफ करनी चाहिए।
सांसदों के अधिकारों और संसद में समय की मांग
इसी बीच, एनडीए के एक अन्य सहयोगी दल और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर मांग की है कि संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के दौरान अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के सांसदों को अपनी बात रखने के लिए अलग से पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
यह मुद्दा सबसे पहले मध्य प्रदेश के खरगोन से भाजपा सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने 5 अगस्त को जीतन राम मांझी के दिल्ली आवास पर हुई एनडीए सांसदों की एक समूह बैठक में उठाया था। सांसद पटेल का तर्क है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाला कुल समय उनके सांसदों की संख्या के अनुसार बंट जाता है, जिससे एससी-एसटी सांसदों को अपने समुदायों के विशेष मुद्दों को उठाने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है।
आरक्षण के मुद्दे पर एनडीए के भीतर मतभेद
एक तरफ जहां एनडीए के घटक दल संसद में एससी-एसटी सांसदों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के मामले में एकजुट नजर आ रहे हैं, वहीं आरक्षण के आंतरिक मुद्दों पर गठबंधन के भीतर स्पष्ट मतभेद भी दिखाई दे रहे हैं:
उप-वर्गीकरण (सब-कैटिगराइजेशन) की मांग: जीतन राम मांझी की पार्टी 'हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा' (HAM) और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन ने एससी-एसटी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का समर्थन किया है, ताकि इसका लाभ समाज के सबसे पिछड़े तबके तक पहुंचे।
आरक्षण की समीक्षा का विरोध: दूसरी ओर, लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने आरक्षण व्यवस्था में किसी भी प्रकार के बदलाव या समीक्षा की बात का कड़ा विरोध करते हुए यहाँ तक कहा है कि ऐसी वकालत करने वालों को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।
इस तरह, जहां एक ओर एनडीए के सहयोगी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और एससी-एसटी सांसदों के अधिकारों को लेकर मुखर हैं, वहीं आरक्षण के नीतिगत मुद्दों पर दलों के अपने अलग-अलग राजनीतिक रुख बने हुए हैं।

