नई दिल्ली: अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी गुट का एक 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल गुरुवार दोपहर 12 बजे नई दिल्ली में चुनाव आयोग (ECI) के पूर्ण पीठ से मुलाकात करेगा। यह प्रतिनिधिमंडल पार्टी के नाम, प्रतिष्ठित चुनावी चिह्न (जोड़ा घास फूल) और लगभग ₹876 करोड़ की दलीय संपत्ति पर अपना दावा ठोकने के साथ ही नए संगठनात्मक बदलावों को आधिकारिक मान्यता देने की मांग करेगा। पश्चिम बंगाल विधानसभा में नवनियुक्त नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने बताया कि चुनाव आयोग ने उन्हें मिलने का समय दिया है, जहां वे पार्टी के लोकतांत्रिक पुनर्गठन के दस्तावेज सौंपेंगे।
ममता बनर्जी को पद से हटाया, नया ढांचा तैयार
बागी गुट के नेताओं के अनुसार, गत 22 जून को कोलकाता में एक विशेष प्रतिनिधि सत्र (Delegate Session) आयोजित किया गया था। इस बैठक में सर्वसम्मति से ममता बनर्जी को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाकर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष और एक नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी (NWC) का गठन किया गया था। ऋतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि इस संगठनात्मक फेरबदल की आधिकारिक जानकारी कोलकाता और नई दिल्ली दोनों मुख्य चुनाव कार्यालयों को पहले ही भेजी जा चुकी है और अब वे इस पर अंतिम मुहर लगवाने आयोग पहुंचे हैं।
पार्टी विभाजन का गणित: बागी गुट के पास दो-तिहाई बहुमत
हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। इस हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष इस कदर बढ़ा कि 3 जून को कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद 15 जून को लोकसभा के 28 में से 20 सांसदों ने भी बगावती रुख अपनाते हुए त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी (NCPI) में अपने विलय का ऐलान कर दिया था। वर्तमान में ममता बनर्जी के खेमे में केवल 22 विधायक और 8 लोकसभा सांसद ही शेष बचे हैं।
दल-बदल कानून और 'शिवसेना' जैसी बगावत की आहट
संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों (10वीं अनुसूची) के अनुसार, किसी भी दल के बागी गुट को बिना सदस्यता गंवाए अलग गुट के रूप में मान्यता या किसी अन्य दल में विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई विधायकों या सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। टीएमसी के इस मामले में बागी गुट के पास विधानसभा और लोकसभा दोनों जगह दो-तिहाई से अधिक का आंकड़ा मौजूद है।
यह पूरी सियासी उठापटक वर्ष 2022 में महाराष्ट्र में हुई शिवसेना की ऐतिहासिक बगावत की याद दिलाती है, जहां एकनाथ शिंदे गुट ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ दो-तिहाई से अधिक विधायकों के साथ विद्रोह किया था। उस वक्त भी चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष ने विधायी बहुमत को आधार मानते हुए शिंदे गुट को ही 'असली शिवसेना' स्वीकार किया था और पार्टी का नाम व चुनाव चिह्न उन्हें सौंप दिया था। अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग तृणमूल के इस हाई-प्रोफाइल विवाद में क्या रुख अपनाता है।





