Friday, July 3, 2026
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‘वे शरणार्थी नहीं, अपने ही देश लौटे थे’— मोहन भागवत का बड़ा बयान

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नागपुर: विभाजन की त्रासदी को झेलकर तत्कालीन पाकिस्तान से भारत का रुख करने वाले विस्थापितों के ऐतिहासिक संघर्ष को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक बहुत बड़ा और नीतिगत बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इतिहास के उस दौर में भारत आए लोगों को 'शरणार्थी' के रूप में संबोधित करना उनके साथ सरासर नाइंसाफी है और यह उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाता है। संघ प्रमुख के अनुसार, वे लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों से लोहा लेने वाले 'संघर्ष के सच्चे योद्धा' थे, जिन्होंने नई पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य के लिए अपनी पीढ़ियों की जमा-पूंजी, आलीशान कारोबार और जमीन-जायदाद को छोड़ना तो स्वीकार किया, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान पर आंच नहीं आने दी।

सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के मंच से संघर्ष को सलाम

जरीपटका, नागपुर में आयोजित सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस (अमृत महोत्सव) के गरिमामयी उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने यह विचार व्यक्त किए। उन्होंने ऐतिहासिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए माना कि वर्ष 1947 में भारत के विभाजन को रोक पाने और राष्ट्र को अखंड रखने के सामूहिक प्रयास भले ही उस समय सफल नहीं हो सके, लेकिन सीमा पार से भारत आने वाले सिंधी समाज के पूर्वजों ने अपने सनातन धर्म, स्वाभिमान और गौरवशाली पहचान के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। मोहन भागवत ने रेखांकित किया कि इन विस्थापितों ने सिर्फ भौगोलिक स्थान नहीं बदला था, बल्कि उनका यह साहसिक फैसला अपने मौलिक जीवन मूल्यों और अटूट आस्था की रक्षा करने का एक पवित्र संकल्प था। ऐसे में उनके अदम्य साहस को केवल एक प्रशासनिक शब्द (शरणार्थी) के दायरे में समेटना उनके बलिदान को बेहद छोटा आंकना होगा।

विवेक और संस्कार जगाने वाली शिक्षा ही वास्तविक

इस ऐतिहासिक संदर्भ के साथ ही संघ प्रमुख ने देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और समाज की दिशा पर भी अपना दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा का परम उद्देश्य महज अकादमिक डिग्रियां हासिल करना या सिर्फ रोजी-रोटी कमाने का साधन बनना नहीं होना चाहिए। यदि देश की पढ़ाई-लिखाई का दायरा केवल नौकरियों तक ही सिमट जाएगा, तो एक मजबूत और आत्मनिर्भर समाज का ताना-बाना बुनना असंभव होगा। उनके अनुसार, वास्तविक और सच्ची शिक्षा वही कही जा सकती है जो किसी भी मनुष्य के भीतर सही और गलत का अंतर करने वाले 'विवेक' को जागृत करे और उसे राष्ट्र के प्रति एक उत्तरदायी व नैतिक नागरिक बनने की अंतःप्रेरणा दे।

शिक्षकों का आचरण और चुनौतियों से न भागने की सीख

युवा पीढ़ी के व्यक्तित्व निर्माण को लेकर उन्होंने अध्यापकों और अभिभावकों की भूमिका को सर्वोपरि बताया। डॉ. भागवत ने कहा कि विद्यार्थी किताबों से केवल किताबी ज्ञान ग्रहण कर सकते हैं, परंतु असल जीवन का व्यावहारिक ज्ञान और उच्च संस्कार उन्हें शिक्षकों के व्यक्तिगत आचरण और चरित्र से ही सीखने को मिलते हैं। इसके साथ ही उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन का प्रेरक प्रसंग साझा करते हुए युवाओं को संदेश दिया कि जीवन पथ पर कठिनाइयां और असफलताएं आना स्वाभाविक हैं, लेकिन उनसे डरकर मैदान छोड़ना या पलायन करना मनुष्यता नहीं है। जो लोग हर प्रकार की प्रतिकूलताओं का डटकर मुकाबला करते हैं, वही अंततः सफलता का इतिहास लिखते हैं और पूरे समाज के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर उभरते हैं।

आरएसएस शताब्दी वर्ष और महत्वपूर्ण बैठकों का बड़ा अपडेट

अपने संबोधन के अंतिम चरण में संघ प्रमुख ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष (1925-2026) के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले आगामी कार्यक्रमों की विस्तृत रूपरेखा देश के सामने रखी। उन्होंने जानकारी दी कि संघ की सबसे महत्वपूर्ण नीति-निर्धारक बैठकों में से एक, 'अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक' आगामी 10 से 12 जुलाई तक कर्नाटक के बेलगावी में आयोजित होने जा रही है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए वह स्वयं 6 जुलाई को वहां पहुंच जाएंगे। इस त्रिदिवसीय महाबैठक में संगठन के देशव्यापी शाखा विस्तार की समीक्षा, भावी सामाजिक गतिविधियों और आगामी राष्ट्रीय जनगणना जैसे समसामयिक विषयों पर गहन चिंतन किया जाएगा।

इसके अलावा, उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के विशेष अवसर पर संघ के समर्पित प्रचारकों के जीवन संघर्ष पर आधारित 100 विशेष प्रेरक वीडियो जारी किए जाएंगे, जबकि ‘डॉ. हेडगेवार: आधुनिक युग के शालिवाहन’ विषय पर तैयार डॉक्यूमेंट्री का भी सार्वजनिक प्रसारण किया जाएगा। इसी कड़ी में 5 जुलाई को नागपुर में ‘सनमार्ग माइंड वेलनेस सेंटर’ का भव्य उद्घाटन भी होना सुनिश्चित हुआ है, जिसमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हो सकते हैं। संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि शताब्दी वर्ष के ये तमाम कार्यक्रम आगामी विजयादशमी यानी 20 अक्टूबर 2026 तक पूरे देश में अनवरत चलते रहेंगे।