अलवर। राजस्थान में सत्ता चाहे भारतीय जनता पार्टी की रही हो या कांग्रेस की, अलवर जिला परिषद में जिला प्रमुख के पद पर लगातार कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा है। साल 2003 से 2018 के दौरान प्रदेश में दो बार भाजपा और दो बार कांग्रेस की सरकारें बनीं, लेकिन भाजपा कभी भी जिला प्रमुख की सीट हासिल नहीं कर पाई। वर्तमान में एक बार फिर राज्य में भाजपा की सरकार है और पार्टी इस बार जिला प्रमुख बनाने का दावा पेश कर रही है। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस अपने मजबूत सियासी इतिहास के सहारे भाजपा के इन दावों को नाकाम करने की रणनीति तैयार कर रही है।
कांग्रेस अपने सभी पार्षद प्रत्याशियों को एकजुट रखकर जिला प्रमुख के पद पर अपना कब्जा बनाए रखने के प्रयास में लगी है। ऐसे में इस बार का चुनाव केवल वोटों की गिनती का न होकर पुराने सियासी समीकरणों को बनाए रखने और बदलने की बड़ी जंग बन गया है। नए जिलों के गठन और परिसीमन के बाद अब अलवर जिला परिषद में कुल 39 वार्ड रह गए हैं।
अलवर जिला प्रमुख का अब तक का इतिहास
साल 2003 में राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद 2005 में हुए चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी टीकाराम जूली जिला प्रमुख चुने गए। इसके बाद 2008 में कांग्रेस की सरकार बनी और 2010 के पंचायत चुनाव में कांग्रेस की सफिया खान ने यह जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2013 में भाजपा की वापसी हुई, लेकिन 2015 में हुए जिला परिषद चुनाव में बाजी कांग्रेस की रेखा यादव के हाथ लगी। 2018 में कांग्रेस सरकार के दौरान 2021 में चुनाव आयोजित हुए, जिसमें कांग्रेस के बलबीर छिल्लर जिला प्रमुख बने, हालांकि बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए।
1985 से कायम है नए चेहरे को मौका देने का चलन
जिला परिषद के इतिहास में साल 1985 से यह परंपरा चली आ रही है कि हर कार्यकाल में एक नए चेहरे को ही मौका मिलता है और किसी भी नेता को दोबारा जिला प्रमुख बनने का अवसर नहीं मिला। कई बार आरक्षण की वजह से दावेदारों की उम्मीदें टूटीं, तो कई बार राजनीतिक दलों ने जनभावना को देखते हुए पुराने चेहरों को दरकिनार कर नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। इस बार भी दोनों दलों के भीतर नए चेहरों की दावेदारी को लेकर खींचतान जारी है, जिससे क्रॉस वोटिंग की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। यही स्थिति प्रधान पद के लिए भी बनी हुई है।

