गोवा चुनाव से पहले सहयोगी दलों में टकराव, मांद्रेम सीट पर फंसा पेंच

पणजी। गोवा में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (MGP) के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। खास तौर पर मांद्रेम विधानसभा सीट को लेकर दोनों दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के संकेत मिल रहे हैं, जहां पूर्व मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर और दयानंद सोप्ते ने हाथ मिला लिया है। दोनों नेताओं का मुख्य उद्देश्य इस सीट पर काबिज MGP विधायक जीत आरोलकर को आगामी चुनाव में शिकस्त देना है।

मांद्रेम सीट पर राजनीतिक समीकरण और पुराना इतिहास

उत्तरी गोवा का तटीय क्षेत्र मांद्रेम राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। इस सीट से तीन बार पूर्व सीएम लक्ष्मीकांत पारसेकर विधायक रह चुके हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पारसेकर की जगह दयानंद सोप्ते को अपना उम्मीदवार बनाया था, जिससे नाराज होकर पारसेकर ने पार्टी छोड़ दी थी और निर्दलीय चुनाव लड़ा था, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। उस चुनाव में MGP के टिकट पर लड़े जीत आरोलकर ने जीत हासिल की थी। अब 2027 के चुनावों से पहले बदले हालात में पारसेकर और सोप्ते ने MGP को घेरने के लिए हाथ मिला लिया है, जिससे बीजेपी के सामने अपने सहयोगी दल के साथ सीट बंटवारे को लेकर उलझन पैदा हो गई है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पारसेकर ने कहा है कि उन्होंने पूरा मामला पार्टी हाईकमान पर छोड़ दिया है।

एमजीपी का दावा और धवलीकर का रुख

दूसरी तरफ, MGP विधायक जीत आरोलकर का कहना है कि उनकी पार्टी बीजेपी के साथ गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, इसलिए वे उम्मीद करते हैं कि बीजेपी के स्थानीय नेता भी गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में उनका समर्थन करेंगे। वहीं, MGP नेता सुदिन धवलीकर ने फिलहाल किसी भी बड़े टकराव से इनकार किया है। उनका कहना है कि पार्टी ने एक आंतरिक सर्वे कराया है जिसके अनुसार उनकी स्थिति कुछ चुनिंदा सीटों पर मजबूत है, हालांकि उन्होंने सीट शेयरिंग को लेकर अभी तक कोई अंतिम दावा नहीं ठोका है।

बीजेपी और एमजीपी का पुराना चुनावी इतिहास

गोवा की राजनीति में MGP का इतिहास बहुत पुराना रहा है। साल 1963 में राज्य को पहला मुख्यमंत्री इसी पार्टी ने दिया था। नब्बे के दशक की शुरुआत में राजनीतिक वजूद बचाने के लिए MGP ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया था, तब MGP बड़े भाई की भूमिका में थी। साल 1994 में बीजेपी ने पहली बार चार सीटें जीतीं, जिसमें MGP के पारंपरिक वोटों का भी बड़ा योगदान था। हालांकि, 1999 के बाद से समीकरण बदलते चले गए और दोनों दल कभी साथ तो कभी अलग चुनाव लड़ते रहे। साल 2012 में दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन बाद के उपचुनावों और चुनावों में दोनों के बीच तनातनी भी देखने को मिली।

मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की नसीहत और पलटवार

मांद्रेम सीट को लेकर छिड़े सियासी संग्राम के बीच गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने MGP को उसकी राजनीतिक जमीन और हैसियत का अहसास कराते हुए नसीहत दी है। एक स्थानीय चैनल से बातचीत में सीएम सावंत ने याद दिलाया कि 2022 के चुनाव में MGP बीजेपी के साथ नहीं थी बल्कि उसने तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और केवल दो सीटें हासिल कर पाई थी। उन्होंने सलाह दी कि पार्टी को बेवजह के सर्वे कराने के बजाय बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर फोकस करना चाहिए। मुख्यमंत्री के इस बयान पर पलटवार करते हुए MGP नेता सुदिन धवलीकर ने दावा किया कि उनकी पार्टी का प्रभाव राज्य के हर कोने में है और उनके पास हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 3,000 कैडर वोट मौजूद हैं।

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