वांगचुक के अनशन पर गरमाई सियासत, अखिलेश यादव ने BJP को घेरा

नई दिल्ली। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा जंतर-मंतर पर शुरू किया गया अनशन अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करार दिया है। नीट पेपर लीक मामले में सरकार की चुप्पी और जवाबदेही के अभाव पर सवाल उठाते हुए अखिलेश यादव ने इसे सत्ता के अहंकार से प्रेरित बताया। उन्होंने कटाक्ष करते हुए पूछा कि क्या यही वह 'अमृत काल' है जिसका वादा जनता से किया गया था।

विपक्ष का समर्थन और वांगचुक का संघर्ष

सोनम वांगचुक के इस आंदोलन को समाजवादी पार्टी का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। पार्टी की सांसद डिंपल यादव, प्रिया सरोज, इकरा सरोज और राजीव राय ने जंतर-मंतर पहुंचकर वांगचुक के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट की है। इससे पूर्व, जब दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को जबरन अस्पताल में भर्ती कराया था, तब भी सपा नेताओं ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए थे। विपक्ष का स्पष्ट मानना है कि वांगचुक की लड़ाई केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि देश के उन लाखों छात्रों की आवाज है, जिनका भविष्य पेपर लीक और लचर शिक्षा व्यवस्था के कारण अंधकार में है।

अनशन समाप्ति के लिए ठोस आश्वासन की मांग

सोनम वांगचुक ने अपने अनशन को समाप्त करने के लिए स्पष्ट शर्तें रखी हैं। उनका कहना है कि उनकी तबीयत भले ही कैसी भी हो, वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस आश्वासन नहीं दे देती। वांगचुक की मुख्य मांग यह है कि सरकार को शिक्षा व्यवस्था में आई हालिया नाकामियों और पेपर लीक जैसी शर्मनाक घटनाओं की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया है कि संसद मार्च के उपरांत ही वे अनशन वापस लेने पर विचार करेंगे, बशर्ते उनकी मांगों को लेकर सरकार एक गंभीर और विश्वसनीय रुख अपनाए।

युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था पर चिंता

शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल सुधार, पेपर लीक पर अंकुश और युवाओं के लिए सुरक्षित भविष्य का निर्माण वांगचुक के आंदोलन के केंद्र बिंदु हैं। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि बार-बार हो रही पेपर लीक की घटनाएं न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाती हैं, बल्कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और मनोबल को भी पूरी तरह तोड़ रही हैं। अब यह आंदोलन केवल दिल्ली तक सीमित न रहकर एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन गया है, जिससे सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया न आना युवाओं के बीच आक्रोश को और अधिक गहरा बना रहा है।

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