काठमांडू। नेपाल की बालेन सरकार कूटनीतिक नियुक्तियों में बड़े विवाद के दलदल में फंस गई है। भाई-भतीजावाद और सिफारिशी कल्चर को खत्म करने के उद्देश्य से शुरू की गई राजदूतों की खुली भर्ती प्रक्रिया ही अब एक बड़े घोटाले और आरोपों के घेरे में आ गई है। सऊदी अरब और जापान के लिए प्रस्तावित राजदूतों के नामों पर गंभीर आरोप लगने के बाद प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) के पारदर्शी और स्वच्छ शासन के दावों पर चौतरफा सवाल उठने लगे हैं।
सऊदी अरब के प्रस्तावित राजदूत पर यौन उत्पीड़न और उगाही का आरोप
सऊदी अरब में राजदूत पद के लिए चुने गए उम्मीदवार गिरि बहादुर सुनार पर सेक्सुअल फेवर मांगने, गंभीर यौन उत्पीड़न और 33 लाख नेपाली रुपये की अवैध उगाही जैसे संगीन आरोप लगे हैं। संसदीय समिति के सामने पेश हुई एक महिला ने गवाही देते हुए आरोप लगाया कि सुनार ने सालों तक उसका मानसिक व शारीरिक शोषण किया। इसके अलावा, नेपाल पुलिस के एक डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) को पदोन्नति दिलाने का झांसा देकर लाखों रुपये की वसूली का भी उन पर आरोप है। हालांकि सुनार ने इन सभी आरोपों को निराधार बताया है, लेकिन संसदीय समिति ने मामले की जांच को गंभीरता से लिया है।
जापान के लिए नामित थापा पर स्थायी निवासी और हितों के टकराव का मुद्दा
दूसरी ओर, जापान के लिए नामांकित राजदूत जिज्ञान कुमार थापा के खिलाफ भी शिकायत दर्ज की गई है। आरोप है कि उनके पास जापान की परमानेंट रेजिडेंसी (PR) है, जो किसी भी देश के कूटनीतिक पद के नियमों के पूरी तरह खिलाफ है। इस पर थापा ने सफाई देते हुए दावा किया कि उन्होंने मार्च में ही अपनी जापानी स्थायी निवास की पात्रता छोड़ दी थी। हालांकि, उनकी पत्नी और बच्चे अभी भी जापान में ही रह रहे हैं, जिससे 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (हितों के टकराव) का मामला लगातार बना हुआ है।
केपी ओली सरकार के बाद खुली प्रक्रिया से हुई थीं सिफारिशें
इस विवाद का पूरा घटनाक्रम मई महीने से जुड़ा है, जब केपी शर्मा ओली की तत्कालीन सरकार के खिलाफ युवाओं में उपजे असंतोष के बाद बालेन्द्र शाह ने सत्ता संभाली थी। बालेन शाह ने कूटनीतिक तंत्र को बदलने के लिए विदेश मंत्रालय के जरिए पहली बार एक खुली प्रतियोगिता आयोजित की। इस प्रक्रिया के तहत दुनिया के एक दर्जन से अधिक देशों में राजदूत चुनने के लिए 4,500 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। तीन महीने की स्क्रीनिंग के बाद 18 सितंबर को 13 राजदूतों की सिफारिश की गई, लेकिन चयन के मानकों को सार्वजनिक नहीं किया गया।
संसदीय समिति की कड़ी परीक्षा और सरकार का रुख
संसद की संयुक्त संसदीय सुनवाई समिति ने नामांकित उम्मीदवारों से तीखे सवाल-जवाब किए हैं। निष्पक्षता के नाम पर शुरू की गई इस चयन प्रक्रिया के बाद उठे गंभीर विवादों ने बालेन सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद इन दागी और विवादित चेहरों की नियुक्ति पर रोक लगाती है या फिर सरकार को अपने फैसले वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

