Pithoragarh News : उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से एक ऐसी भावुक कहानी सामने आई है, जिसने पूरे इलाके के लोगों की आंखे नम कर दी . 46 साल पहले घर छोड़कर लापता हुआ बेटा अचानक साधु के वेश में अपने गांव लौटा. मां भले ही बूढी हो गई थी लेकिन देखते ही बेटे को पहचन लिया. बेरीनाग के दौलीगाड़ गांव में हुए इस भावुक मिलन को देखने वाले ग्रामीण भी अपने आंसू नहीं रोक सके. मां और बेटे का यह मिलन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था.
मां तो मां होती है… 45 साल बाद भी एक नजर में पहचान लिया अपने बेटे को … बेटा 45 साल पहले घऱ छोड़ कर चला गया था और और जब लौटा तो साधु बनकर …और अपनी मां से ही भिक्षा लेने की जिद करने लगा … जिसने भी मां बेटे के इस मिलन को देखा , अपने आंसू रोक नहीं पाया… pic.twitter.com/T2T2A9RbCZ
— The Bharat Now (@thebharatnow) June 8, 2026
Pithoragarh News : 15 साल की उम्र में अचानक हो गया था लापता
जानकारी के अनुसार, दौलीगाड़ गांव निवासी बुद्धि बल्लभ उपाध्याय वर्ष 1980 में महज 15 साल की उम्र में अचानक घर से लापता हो गए थे. परिवार ने उनकी तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उनका कोई पता नहीं चल पाया.
समय बीतता गया और परिवार उम्मीद तथा निराशा के बीच झूलता रहा. वर्ष 2005 में उनके पिता तारा दत्त उपाध्याय का निधन भी हो गया, लेकिन मां नंदी देवी ने बेटे के लौटने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ी.
मां के इंतजार में गुजर गए 46 साल
एक मां का दिल हमेशा अपने बेटे के लौटने की आस लगाए रहा. दिन महीनों में और महीने वर्षों में बदलते गए, लेकिन नंदी देवी की निगाहें हर आने-जाने वाले रास्ते पर बेटे को तलाशती रहीं.
करीब 46 साल बाद जब उनका बेटा गांव पहुंचा तो उसकी पहचान करना आसान नहीं था. वह अब एक संन्यासी बन चुका था.
साधु के वेश में लौटा बेटा
सिर पर लंबी जटाएं, शरीर पर भगवा वस्त्र और चेहरे पर वैराग्य का भाव लिए जब बुद्धि बल्लभ उपाध्याय गांव पहुंचे तो लोग उन्हें पहचान नहीं पाए लेकिन मां ने अपने बेटे को देखते ही पहचान लिया.
जैसे ही मां और बेटे की नजरें मिलीं, दोनों भावुक हो उठे. नंदी देवी बेटे से लिपटकर रो पड़ीं और वर्षों का दर्द खुशी के आंसुओं में बह निकला.
मां के हाथों भिक्षा लेने की इच्छा ने कराया मिलन
जब ग्रामीणों ने उनसे पूछा कि इतने वर्षों बाद उन्हें घर लौटने की प्रेरणा कहां से मिली, तो उनका जवाब सभी को भावुक कर गया.
उन्होंने बताया कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा अपनी मां के हाथों से भिक्षा लेने की थी. यही अधूरी हसरत उन्हें दशकों बाद अपने गांव और अपनी मां के पास वापस खींच लाई.
भिक्षा लेने के बाद फिर छोड़ गया मां का आंचल
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि बेटे की वापसी स्थायी नहीं थी. संन्यास का मार्ग अपना चुके बुद्धि बल्लभ अब सांसारिक बंधनों से दूर हो चुके हैं.
मां के हाथों भिक्षा लेने का संकल्प पूरा करने के बाद उन्होंने 7 जून को एक बार फिर गांव और अपनी मां को अलविदा कह दिया. इसके बाद वह दोबारा अध्यात्म और साधना की राह पर निकल पड़े.
गांव में चर्चा का विषय बना भावुक मिलन
46 साल बाद मां-बेटे के इस मिलन ने पूरे क्षेत्र को भावुक कर दिया है. गांव के लोग इसे चमत्कार से कम नहीं मान रहे। वहीं, यह कहानी एक मां के अटूट विश्वास, प्रेम और इंतजार की मिसाल बन गई है.
मां की ममता और बेटे की भिक्षा लेने की इच्छा से जुड़ी यह घटना आज पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बनी हुई है.

