Monday, July 22, 2024

बदलते रिश्ते की दास्तान- मुलामय के टीपू या नेता जी के अखिलेश

सत्ता अपराध करा सकती है, सत्ता रिश्तों में दरार डाल सकती है. सत्ता के लिए एक पुत्र पिता का सहारा बन सकता है तो वहीं पुत्र सत्ता की खातिर पिता के सामने खड़ा भी हो सकता है. शाहजहां और औरंगजेब की कहानी तो सुनी होगी आप ने, कहते है सत्ता की खातिर औरंगज़ेब ने न सिर्फ अपने भाइयों का कत्ल करवाया बल्कि पिता को बंधक भी बना लिया. मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव पर भी ऐसे ही आरोप लगे. कहा गया कि सत्ता की खातिर उन्होंने पहले अपने पिता से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी छीनी. फिर बचपन से देखभाल करने वाले चाचा को पार्टी से बाहर किया. इतना ही नहीं आरोप ये भी लगा कि उन्होंने पिता को घर में कैद भी कर लिया. तो क्या हमेशा से ऐसे ही तल्ख थे मुलायम सिंह के अपने बेटे टीपू से रिश्ता.

बीमार पिता के साथ मेदांत अस्पताल में अखिलेश यादव को देख कोई नहीं कह सकता था कि ये वही अखिलेश है जिनपर पिता को कैद करने और उनका अपमान करने का आरोप लगता रहा है.
मुलायम सिंह का हालचाल जानने पहुंचते नेताओं और उनके साथियों को पिता की गंभीर हालात बता अखिलेश मायूस नज़र आते. लोग ढांढस बंधा के चले जाते. लेकिन दिन-ब-दिन बिगड़ती पिता की तबीयत की चिंता बेटे टीपू के चेहरे पर साफ नज़र आती.

1973 में जन्में अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी के पुत्र है. बचपन में मां की बीमारी और पिता के राजनीति में व्यस्त होने के चलते अखिलेश की देखभाल की जिम्मेदारी चाचा शिवपाल यादव पर थी. चाचा साइकिल पर स्कूल ले जाते, टॉफी और चॉकलेट दिलाते, लेकिन पिता के प्यार की कमी कैसे पूरी कर पाते. अखिलेश बचपन से पढ़ाई में तेज़ और हिम्मत वाले थे. पिता और चाचा के वो लाडले थे. मुलायम सिंह यादव के बेटे होने का न कभी उन्होंने फायदा उठाना चाहा न पिता ने कभी इसकी अनुमति दी. बताया जाता है कि मुख्यमंत्री पिता से मिलने के लिए अखिलेश को लाइन में लगना पड़ा था. घटना राजस्थान के धौलपुर मिलिट्री स्कूल की है. अखिलेश यादव यहां पढ़ाई कर रहे थे. मुलायम सिंह यादव तब यूपी के मुख्यमंत्री थे. बतौर मुख्यमंत्री उन्हें स्कूल आने का निमंत्रण दिया गया. ये पहला मौका था जब मुलायम सिंह अपने बेटे के स्कूल जा रहे थे. लेकिन इस बार वह यूपी के मुख्यमंत्री की हैसियत में थे पिता की नहीं. मुलायम सिंह की अगवानी में स्कूल का पूरा लाव-लश्कर लगा हुआ था. जैसे ही मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर स्कूल के मैदान में उतरा, तो सीनियर क्लास के बच्चे उनके स्वागत के लिए एक लाइन बना कर खड़े हो गए. ताकि वह मुलायम सिंह यादव से मिल सकें. बताया जाता है कि अखिलेश यादव भी इस लाइन का हिस्सा थे. अपने पिता से मिलने के लिए अखिलेश कतार में सावधान की मुद्रा में खड़े थे. पूरे कार्यक्रम के दौरान भी अनुशासन का पालन करते हुए वह आम छात्रों के लिए तय स्थान पर ही बैठे रहे.
वैसे ऐसा नहीं है कि पिता और पुत्र के रिश्ते में सिर्फ अनुशासन ही था. अखिलेश यादव जब कर्नाटक से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे. तब एक बार मुलायम सिंह मैसूर दौरे पर आए. अखिलेश के दोस्तों ने उनसे जिद की कि वह यूपी के मुख्यमंत्री से मिलना चाहते है. अखिलेश ने दोस्तों को पिता से मिलाने का वादा कर दिया. बताया जाता है कि अपने वादें को पूरा करने के लिए अखिलेश ने पिता से खूब जिद की. नतीजा ये हुआ की मुलायम सिंह यादव न सिर्फ अखिलेश के दोस्तों से मिले बल्कि उनके एक अच्छे दोस्त अशरफ के घर में 15 मिनट रुके और कर्नाटक के मशहूर मिठाई मैसूर पाक भी खाई.
अखिलेश यादव जब ऑस्ट्रेलिया में पढ़ रहे थे. तब मुलायम सिंह यादव देश के रक्षा मंत्री थे.

डिंपल से शादी के खिलाफ थे मुलायम सिंह
मुलायम सिंह यादव कई बार बेटे की जिद्द के आगे झुके. ऐसा ही एक मौका था अखिलेश और डिंपल की शादी. बताया जाता है कि दोनों की लव स्टोरी 90 के दशक में शुरू हुई. पुणे में पैदा हुई डिंपल उत्तराखंड की रहने वाली हैं. अखिलेश यादव और डिंपल यादव की पहली मुलाकात लखनऊ में हुई थी, उस वक्त अखिलेश 21 साल के और डिंपल 17 साल की थीं. ये बात उनके ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले की है. ऑस्ट्रेलिया जाने के बाद भी दोनों टच में रहे. जब अखिलेश ऑस्ट्रेलिया से लौटे तो उनपर शादी की दबाव बनाया जाने लगा. अखिलेश डिंपल से शादी करना चाहते थे. लेकिन पिता को ये बात बताने से डरते थे. कहा जाता है कि पिता को मनाने के लिए उन्होंने अपनी दादी की मदद ली. पिता मुलायम सिंह यादव इस शादी के खिलाफ थे कहा जाता है कि वो अखिलेश के लिए लालू प्रसाद यादव की बेटी को पसंद कर चुकें थे. उधर डिंपल के कर्नल पिता को भी शादी से एतराज़ था. लेकिन आखिर में पिता को बेटे के प्यार के आगे झुकना पड़ा. इतना ही नहीं पहले-पहल तो मुलायम सिंह डिंपल के राजनीति में आने के भी खिलाफ थे.

रिश्तों में कब आई दूरियां
कहा जाता है पिता पुत्र के प्यार को पहला झटका लगा साल 2003 में, जब मुलायम सिंह यादव ने अपनी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता को पहली बार सार्वजनिक तौर पत्नी का दर्जा दिया. ये वह साल था जब अखिलेश यादव की मां और मुलायम सिंह की पहली पत्नी मालती देवी का निधन हुआ था. अखिलेश इस बात से काफी नाराज़ थे कि मुलायम सिंह ने साधना गुप्ता को पत्नी स्वीकार कर लिया हैं. साल 2000 में अखिलेश राजनीति में कदम रख चुकें थे. परिवार के करीबी बताते है कि अखिलेश सिर्फ इस शर्त पर माने थे कि साधना के बेटे प्रतीक यादव राजनीति से दूर रहेंगे. वैसे प्रतीक और उनकी माताजी साधना गुप्ता तो राजनीति से दूर ही रहे. लेकिन साधना गुप्ता की बहू और प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव ने जरूर राजनीति में कदम रखा. फिलहाल अपर्णा विधानसभा का चुनाव जीत बीजेपी की विधायक हैं.

रिश्ते को दूसरा झटका लगा 2016 में

साल 2000 से लेकर 2012 तक अखिलेश पिता के कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे. 2012 विधानसभा चुनाव में मिली जीत का सेहरा भी उनके ही सर बंधा और वो मुख्यमंत्री बने. लेकिन कहते है न सत्ता अपने साथ दुश्मन भी लाती है. जिस चाचा को अखिलेश के बचपन में देखभाल की जिम्मेदारी दी गई थी उसे चाचा शिवपाल से अखिलेश की अनबन होने लगीं. आरोप ये भी लगे की चाचा सौतेली मां के साथ मिलकर अखिलेश को साइड करना चाहते थे. चाचा भतीजे में ऐसी खींच तान मची कि 30-12-2016, को मुलायम सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला बेटे को अनुशासन हीनता और पार्टी को कमजोर करने का आरोप में 6 साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया. असल में अखिलेश यादव ने चुनाव के लिए पार्टी उम्मीदवारों की एक अलग लिस्ट जारी कर दी थी. चाचा भतीजे की इस लड़ाई में मुलायम भाई के साथ थे. फिर आया 6 जनवरी 2017 का दिन, पार्टी की सभा में ऐसा नज़ारा देखने को मिला की लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. अखिलेश पिता के हाथों से माइक छीनते नज़र आए. बेटे पर भाई को तरजीह देने वाले मुलायम सिंह ने तब कहा था कि “अखिलेश उनकी नहीं सुनते”. परिवार की लड़ाई सड़क पर आ गई थी. पिता से नाराज अखिलेश ने 16-फरवरी-2017 को एक बयान दिया. अखिलेश ने कहा “मुझे ये एकदम भी गुमान नहीं है कि पार्टी हमारी है, ये पार्टी नेताजी की है. लेकिन राजनीति का रास्ता टेड़ मेडा है.” अपने बयान में अखिलेश ने सीधे तो नहीं पर पिता से सवाल ज़रुर किया था कि आखिर मेरा कसूर क्या हैं?

वैसे पिता मुलायम सिंह की नाराजगी बेमतलब नहीं थी. 2017 चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने अपने पिता को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटा कर उसपर कब्जा कर लिया था. इतना कम था कि उन्होंने चाचा शिवपाल को मंत्रिमंडल से और मुलायम के सबसे करीबी दोस्त अमर सिंह को पार्टी के बाहर कर दिया था.
इन सब चीजों से मुलायम सिंह इतने नाराज़ थे कि उन्होंने 2017 चुनाव प्रचार से दूरी बना ली. साथ ही एक बयान भी दिया जो विपक्षी दलों के हाथ में अखिलेश के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन गया.
मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को लेकर कहा कि “जो अपने पिता का न हुआ वो किसी का क्या होगा.”
ये वो मुश्किल वक्त था जब पिता-पुत्र का रिश्ता तो टूट की कगार पर था ही पर परिवार भी बिखराव के रास्ते पर था. कहा जाता है इस वक्त डिंपल यादव ने न सिर्फ परिवार को बल्कि पिता-पुत्र के रिश्ते को भी बांधा कर रखा. एक वो समय था जब डिंपल, मुलायम सिंह की पसंद नहीं थी और फिर वो समय भी आया जब 2017 में मुलायम सिंह ने अपनी पसंदीदा बहू को कन्नौज से निर्विरोध चुनावी जीत दिलाई.
2017 के बाद चाचा भतीजे के रिश्ते में आई कड़वाहट बढ़ती ही गई. और नतीजा ये हुआ की पिता और पुत्र का रिश्ता भी बिगड़ता गया. 2022 विधानसभा चुनाव में चाचा भतीजा फिर एक हुए लेकिन इस दौरान भी अखिलेश यादव पर पिता को कैद करके रखने का इल्जाम लगता रहा.

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