Sunday, April 14, 2024

क्या बिलकिस बानो के सम्मान की रक्षा करेंगे पीएम मोदी?

औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जाएगा, जुल्म करने वाला सीना पुरज़ोर बनता जाएगा.
बात ज़रुर गुजरात दंगों की सामूहिक बलात्कार पीड़िता बिलकिस बानो के मामले में 11 दोषियों के रिहा किए जाने से शुरु हुई है लेकिन बहस व्यापक है कि एक तरफ जब प्रधानमंत्री महिलाओं के सम्मान, रोज़मर्रा के जीवन में महिलाओं के प्रति आदर के भाव की बात करते हैं. जब लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री महिलाओं के समाज में योगदान को सलाम करते हैं, ठीक उसी दिन दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी की सरकार गुजरात में सामूहिक बलात्कार और कत्ल जैसे जघन्य अपराध में सजा काट रहे दोषियों को रिहा कर देती है.
सवाल ये है कि जब बलात्कार के दोषी समाज में खुले घूमेंगे तो महिला सम्मान का क्या मतलब रह जाएगा? सवाल ये भी है कि क्या दंगों के दौरान की गई हिंसा को अपराध नहीं माना जाएगा? क्या दंगों की हिंसा में शामिल लोगों को सिर्फ इसलिए माफ कर दिया जाएगा कि उसमें जुल्म करने वाला किसी एक ऐसे समुदाय से जुड़ा है जो किसी एक पार्टी का वोट बैंक है? ये सवाल इसलिए भी कि जो 11 लोग रिहा किए गए उन्हें मिठाई खिलाई गई, उनकी आरती उतारी गई. एक संगठन के कार्यालय में उनका स्वागत और सत्कार भी हुआ.
सोचिए उस बिलकिस के बारे में जो 3 मार्च 2002 में 21 साल की थी. गोधरा में ट्रेन जलाने की घटना के बाद हुए दंगों में बिलकिस ने अपनी कोख में पल रहे 5 महीने के गर्भ और तीन साल के बच्चे समेत परिवार के 6 लोगों को खो दिया था. दंगाईयों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया. वह बेहोश हो गई तो वो उसे मरने छोड़ गए. तीन घंटों तक वह बेहोश रही, आँख खुली तो दर्द से बदन चूर था. हिम्मत जवाब दे गई थी. कैसे 21 साल की बिलकिस ने हिम्मत जुटाई होगी. कैसे उसने न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी होगी. कैसे वो अपने दोषियों को उम्रकैद की सज़ा दिलवा पाई होगी. बिलकिस की लड़ाई हरगिज आसान नहीं थी. अपने मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर हो उसके लिए उसे दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट तक आना पड़ा. तब जाकर न्याय उसके हाथ लगा. लेकिन आज़ादी के 75 साल पूरे होने के जश्न पर गुजरात सरकार ने उसके 11 दोषियों को जेल से रिहा कर दिया. उन दोषियों को जिन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाते हुए कोर्ट ने 14 साल नहीं आखिरी सांस तक जेल में रखे जाने का हुक्म दिया था. सरकार के कदम के बाद बिलकिस का बयान तो नहीं आया लेकिन उनके पति याकूब रसूल ने कहा कि उन्हें मीडिया के जरिए रिहाई के बारे में पता चला. “हम इस चौंकाने वाली ख़बर को सुनकर हैरान रह गए. हमें नहीं पता कि दोषियों ने कब अपने आवेदन पर कार्रवाई की और किस सरकार ने इसे तय करने के लिए संज्ञान लिया. हमें किसी तरह का नोटिस भी नहीं दिया गया.’ बिलकिस के पति ने कहा कि इस फैसले के बाद ख़ुद को और अपने परिवार को सुरक्षित महसूस नहीं करते.
गुजरात में साल 2002 में हुए दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या के मामले में जेल में उम्रकैद की सजा पाने वाले सभी 11 अभियुक्तों को गोधरा जेल से रिहा कर दिया गया है. 11 दोषियों की रिहाई को लेकर कांग्रेस पार्टी गुजरात सरकार के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी हमालवर है. कांग्रेस ने अभियुक्तों की रिहाई को लेकर सरकार के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं.
कांग्रेस नेता खेड़ा ने कहा कि जहां पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान महिलाओं के मुद्दों पर कई बड़ी-बड़ी बातें कही. वहीं कुछ घंटे बाद भाजपा शासित गुजरात सरकार ने इस तरह के जघन्य अपराध के अपराधियों को छूट देने की घोषणा की. खेड़ा ने हमला करते हुए कहा, “आपने दोषियों को उनकी सजा के 14 साल बिताने का हवाला देते हुए कहा कि जेल में उनका आचरण अच्छा था, और अपराध की प्रकृति का क्या… अगर हम सिर्फ अपराध की प्रकृति पर विचार करते हैं, तो क्या बलात्कार उस श्रेणी में नहीं आता जिसकी कड़ी से कड़ी सजा दी जाए, जबकि कोई भी सजा काफी नहीं है? और हमने यह भी देखा कि बलात्कार के जो अभियुक्त रिहा किए गए, उनकी आरती उतारी जा रही है, तिलक लगाया जा रहा है। क्या यही है – अमृत महोत्सव.”
फैसले के ख़िलाफ़ ट्वीट करते हुए एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने कड़े शब्दों में पीएम का मजाक उड़ाया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश से ऐसा कुछ नहीं करने को कहा जिससे महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचे. “उन्होंने ‘नारी शक्ति’ का समर्थन करने के बारे में कुछ कहा. गुजरात की भाजपा सरकार ने उसी दिन सामूहिक बलात्कार के दोषी अपराधियों को रिहा कर दिया. संदेश स्पष्ट है, बाद में एक संवाददाता सम्मेलन में ओवैसी ने बीजेपी पर आरोप लगाया की वो सिर्फ एक समुदाय के लिए पक्षपाती फैसले लेती है.
गुजरात सरकार के इस फैसले का महिला अधिकार संगठन, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ (AIPWA) ने भी निंदा की और कहा कि बिलकिस बानो के बलात्कारियों को मुक्त करने का निर्णय ऐसे पुरुषों और उनके अनुयायियों को उनकी धमकियों पर कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित करता है. “सांप्रदायिक हत्यारों और बलात्कारियों की सजा भारत में एक विपथन है, नियम नहीं. क्या छूट का इरादा सांप्रदायिक हत्यारों और बलात्कारियों के लिए दण्ड से मुक्ति के नियम को बहाल करना है?
एक और महिला संगठन एआईडीडब्ल्यूए (AIDWA) एडवा ने बिलकिस बानो मामले में सड़क पर संघर्ष का एलान किया है.
वैसे इस मामले में चौंकाने वाली बात ये भी रही कि एक दोषी राधेश्याम भगवान दास शाह ने 15 साल से अधिक जेल की सजा काटने के बाद समय से पहले रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. शीर्ष अदालत ने न सिर्फ उसकी याचिका मंजूर की बल्कि गुजरात सरकार को उनकी सजा माफ करने के मुद्दे पर गौर करने का निर्देश भी दे दिया. सरकार ने एक समिति का गठन किया. पैनल की अध्यक्षता करने वाली पंचमहाल की कलेक्टर सुजल मायात्रा ने कहा, ‘कुछ महीने पहले गठित समिति ने मामले के सभी 11 दोषियों की छूट के पक्ष में सर्वसम्मति से निर्णय लिया. राज्य सरकार को सिफारिश भेजी गई और स्वतंत्रता दिवस पर दोषियों को रिहा कर दिया गया.
इस रिहाई के साथ ही वो न्याय भी अधूरा रह गया जिसे बिलकिस बानो ने एक लंबी लड़ाई के बाद हासिल किया. दोषियों की रिहाई के बाद बिलकिस के जीवन में फिर एक नए संघर्ष की शुरुआत हो गई है. चाहे वो कानूनी लड़ाई के रूप में हो या समाज की उस सोच के खिलाफ जो उसके दोषियों का सम्मान और सत्कार कर रहे हैं. उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी बिलकिस की इस लड़ाई में उसका साथ देंगे और महिला के सम्मान के अपने विचार को हकीकत का जामा पहनाएंगे.

 

 

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