Friday, February 23, 2024

बिलकिस के 11 दोषियों की रिहाई के खिलाफ SC में PIL दायर

बिलकिस बानो के 11 दोषियों को रिहा करने के गुजरात सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. एक जनहित याचिका दायर कर सभी दोषियों की सजा पर फिर से विचार करने की गुहार लगाई गई है. इस याचिका को सामाजिक कार्यकर्ता सुभाषिनी अली, रेवती लाल, रूप रेखा वर्मा की ओर से कोर्ट में दायर किया गया है. मंगलवार को CJI की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच के समक्ष बिलकिस बानो मामला उठाया गया. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अधिवक्ता अपर्णा भेट ने कोर्ट के समक्ष ये मामला रखा. अधिवक्ता भट्ट ने कोर्ट से मामले की सुनवाई कल यानी बुधवार को करने का आग्रह किया. जिस पर बेंच ने याचिका को स्वीकार कर लिया है.
क्या है पूरा मामला
बिलकिस बानो गैंगरेप मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए सभी 11 दोषियों को 15 अगस्त को गोधरा उप-जेल से रिहा कर दिया गया था. गुजरात सरकार की सजा माफी योजना के तहत उन्हें रिहा किया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने एक दोषी की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से अपनी 1992 की छूट नीति के तहत राहत के लिए उनकी याचिका पर विचार करने के निर्देश दिए थे जिसके बाद गुजरात सरकार ने एक कमेटी बना गुजरात सरकार ने ये फैसला लिया की सभी 11 दोषियों को रिहा कर दिया जाए.
आपको बता दें मुंबई की एक स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने 21 जनवरी, 2008 को बिलकिस बानो के परिवार के 7 सदस्यों की हत्या और उसके गैंगरेप के मामले में सभी 11 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा था.
बिलकिस बानो ने दोषियों की रिहाई पर क्या कहा था
बिलकिस बानो ने सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा था कि ‘इतना बड़ा और अन्यायपूर्ण फैसला’ लेने से पहले किसी ने उनकी सुरक्षा के बारे में नहीं पूछा और ना ही उनके भले के बारे में सोचा. उन्होंने गुजरात सरकार से इसे बदलने और उन्हें ‘बिना डर के शांति से जीने’ का अधिकार देने को कहा था.
“दो दिन पहले, 15 अगस्‍त 2022 को पिछले 20 साल का दर्द फिर से उभर आया. जब मैंने सुना कि जिन 11 दोषियों ने मेरे परिवार और मेरी जिंदगी को तबाह किया था और मेरी 3 साल की बेटी को मुझसे छीना था, आजाद हो गए हैं. मेरे पास कहने के लिए शब्द नहीं हैं. मैं स्तब्ध हूं. मैं केवल यही कह सकती हूं-किसी महिला के लिए न्‍याय आखिर इस तरह कैसे खत्म हो सकता है? मैंने अपने देश के सर्वोच्च कोर्ट पर भरोसा किया, मैंने सिस्‍टम पर भरोसा किया और मैं धीरे-धीरे इस बड़े ‘आघात’ के साथ जीने की आदत डाल रही थी. इन दोषियों की रिहाई ने मेरे जीवन की शांति छीन ली है और न्याय के प्रति मेरे विश्वास को हिला डाला है. मेरा गम और डगमगाता भरोसा केवल मेरे लिए नहीं है, बल्कि हर उस महिला के लिए है जो अदालतों में न्याय के लिए संघर्ष कर रही है. इतना बड़ा और अन्यायपूर्ण फैसला लेने के पहले किसी ने भी मेरी सुरक्षा और भले के बारे में नहीं सोचा. मैं गुजरात सरकार से अपील करती हूं कि फैसले को वापस ले. बिना किसी भय और शांति से मेरे जीने का अधिकार वापस दें”

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