गर्भावस्था (प्रेग्नेंसी) किसी भी महिला के जीवन का सबसे अधिक संवेदनशील, नाज़ुक और महत्वपूर्ण दौर होता है। इस विशेष समयावधि के दौरान होने वाली माता की शारीरिक व मानसिक सेहत के साथ-साथ गर्भ में पल रहे शिशु का संपूर्ण विकास पूरी तरह से उसकी जीवनशैली, खानपान और ली जाने वाली दवाइयों पर निर्भर करता है। यही कारण है कि महिला चिकित्सक (स्त्री रोग विशेषज्ञ) गर्भवती महिलाओं को अपना विशेष ध्यान रखने और हर कदम पर सावधानी बरतने की सलाह देती हैं।
क्या गर्भवती महिलाओं को दवाइयाँ नहीं खानी चाहिए?
अक्सर आपने अपने परिवार या समाज के बुजुर्गों से यह कहते हुए जरूर सुना होगा कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को किसी भी प्रकार की दवाइयों का सेवन करने से बचना चाहिए। लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है? आइए आज इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करते हैं और जानते हैं कि डॉक्टर बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएँ लेने से क्यों मना करते हैं।
भ्रूण के शारीरिक विकास पर गहरा असर
गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीने, जिन्हें चिकित्सीय भाषा में 'फर्स्ट ट्राइमेस्टर' (First Trimester) कहा जाता है, गर्भस्थ शिशु के अंगों के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण चरण होते हैं। इसी अवधि के दौरान बच्चे का मस्तिष्क, हृदय, रीढ़ की हड्डी, हाथ-पैर और अन्य प्रमुख आंतरिक अंगों का आकार लेना शुरू होता है। यदि इस नाजुक समय में बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श के कोई भी दवा खाई जाती है, तो उसमें मौजूद रासायनिक तत्व भ्रूण के सामान्य विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। इसके परिणामस्वूप जन्मजात विकार (congenital defects), अंगों के विकास में कमी या अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का भारी जोखिम पैदा हो सकता है। यही वजह है कि शुरुआती महीनों में किसी भी दवा का उपयोग केवल डॉक्टर की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।
प्लेसेंटा के माध्यम से शिशु तक पहुँच जाती हैं दवाइयाँ
गर्भावस्था के दौरान माँ और गर्भस्थ शिशु के बीच पोषण, ऑक्सीजन और अन्य तत्वों का आदान-प्रदान 'प्लेसेंटा' (आलना) के जरिए होता है। यही प्लेसेंटा कई प्रकार की दवाइयों के हानिकारक रसायनों और तत्वों को भी फिल्टर किए बिना सीधे भ्रूण तक पहुँचा सकता है। कुछ विशेष दवाइयाँ बच्चे के शरीर में एकत्र होकर उसके विकास में बाधा बन सकती हैं या जन्म के उपरांत बच्चे में गंभीर स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का कारण बन सकती हैं। इसलिए डॉक्टर गर्भवती महिलाओं को केवल वही दवाइयाँ लेने की हिदायत देते हैं जो वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित और आवश्यक हों।
गर्भपात (मिसकैरेज) का बढ़ जाता है खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ दवाइयाँ गर्भाशय (यूटरस) की मांसपेशियों में तीव्र संकुचन (contractions) पैदा कर सकती हैं या शरीर के हॉर्मोनल संतुलन को बिगाड़ सकती हैं। इसके कारण शुरुआती गर्भावस्था में गर्भपात होने का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, गर्भावस्था के बाद के महीनों में ऐसी अनियंत्रित दवाइयों का सेवन समय से पहले प्रसव (लेबर पेन) का कारण भी बन सकता है। यही कारण है कि बिना डॉक्टर की पर्ची के किसी भी प्रकार की पेनकिलर (दर्द निवारक), हार्मोनल दवाइयाँ या एंटीबायोटिक्स लेने की सख्त मनाही होती है।
समय से पूर्व डिलीवरी (प्रीमैच्योर बर्थ) का जोखिम
गर्भावस्था के दौरान किसी भी दवा का गलत, अनियंत्रित या अत्यधिक उपयोग गर्भाशय में असामयिक संकुचन शुरू कर सकता है, जिससे 'प्रीमैच्योर डिलीवरी' की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात शिशुओं में श्वास लेने में कठिनाई, जन्म के समय बेहद कम वजन, संक्रमण (इन्फेक्शन) और अन्य गंभीर स्वास्थ्य विकारों का खतरा आम बच्चों की तुलना में काफी ज्यादा होता है। इसलिए गर्भावस्था में हर एक दवा का चयन केवल एक योग्य चिकित्सक की सख्त निगरानी में ही होना चाहिए।
क्या इसका अर्थ यह है कि गर्भावस्था में कोई दवा नहीं लेनी चाहिए?
बिल्कुल नहीं। इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि गर्भवती महिला को कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए। यदि किसी गर्भवती महिला को पहले से मधुमेह (डायबिटीज), उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर), थायराइड, अस्थमा या किसी प्रकार का गंभीर संक्रमण जैसी स्वास्थ्य समस्या है, तो डॉक्टर उसकी स्थिति के अनुसार पूरी तरह सुरक्षित दवाइयाँ निर्धारित करते हैं।
आवश्यक बात यह है कि बिना डॉक्टर की सलाह के अपनी मर्जी से कोई भी नई दवा न तो शुरू करें और न ही पहले से चल रही दवा को बंद करें, क्योंकि ऐसा करना जज्जा और बच्चा दोनों के लिए अत्यधिक जोखिम भरा साबित हो सकता है।

