बच्चों के सामने माता-पिता इन बातों का रखें खास ध्यान

बच्चों का मन बेहद कोमल, संवेदनशील और कच्ची मिट्टी की तरह होता है। वे अपने आसपास के परिवेश, माहौल और अभिभावकों के आचार-विचार को बहुत जल्दी ग्रहण करते हैं, जिसका सीधा प्रभाव उनके स्वभाव और मानसिक विकास पर देखने को मिलता है। अक्सर कुछ बच्चे बहुत अधिक जिद्दी हो जाते हैं, बात-बात पर अत्यधिक गुस्सा करना, चिड़चिड़ापन दिखाना या बड़ों की बात सुनने में आनाकनी करना जैसी आदतें अपना लेते हैं, जिससे उनके माता-पिता खासे परेशान रहते हैं। कई बार इस तरह के नकारात्मक व्यवहार के पीछे खुद अभिभावकों का बच्चों के प्रति रवैया भी जिम्मेदार होता है, जिसके बारे में वे अनजाने में गलतियां कर बैठते हैं। यदि आप भी अपने बच्चे के इस प्रकार के स्वभाव से चिंतित हैं, तो आपको उसके लालन-पालन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

शारीरिक या मानसिक दंड देने से बचें

बच्चों के भीतर आत्मसम्मान और समझ की भावना बहुत कम उम्र यानी करीब 3 से 4 वर्ष की अवस्था में ही विकसित होने लगती है। यदि आप ऐसे छोटे बच्चों को किसी रिश्तेदार या अन्य लोगों के सामने डांटते-फटकारते हैं या उनके साथ मारपीट करते हैं, तो इससे उनके नाजुक आत्मसम्मान को गहरा धक्का पहुंचता है। इस तरह के कठोर व्यवहार से उनके अंदर की कुछ भी नया सीखने और समझने की प्रेरणा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। इसलिए, यदि आपका बच्चा कभी कोई गलती करे, तो सार्वजनिक रूप से डांटने के बजाय उसे एकांत में ले जाकर प्यार से समझाना चाहिए।

गलतियों को सुधारने के लिए अपनाएं स्नेहिल तरीका

बचपन की सहज प्रवृत्ति में गलतियां करना शामिल होता है, जिसका यह कतई अर्थ नहीं है कि आप बच्चे द्वारा की गई छोटी-सी चूक पर भी उसे शारीरिक रूप से दंडित करने लगें। सबके सामने बच्चों को मारने या डांटने से उनका स्वभाव और अधिक चिड़चिड़ा हो जाता है, उन्हें बहुत जल्दी क्रोध आने लगता है और माता-पिता के प्रति उनके मन का सम्मान भी कम होने लगता है। इसलिए बच्चों को गलती का अहसास कराने के लिए गुस्से का सहारा लेने के बजाय उन्हें प्यार से गले लगाकर सही रास्ता दिखाना चाहिए।

बच्चों की दिनचर्या और गतिविधियों पर रखें पैनी नजर

कई बार स्वभाव से अति-क्रोधित रहने वाले बच्चे अपने सहपाठियों या दोस्तों के साथ छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करने लगते हैं। अभिभावकों को ऐसे बच्चों की किसी भी हरकत या गलती को नजरअंदाज करने की भूल बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। इसके लिए बच्चों के स्कूल के शिक्षकों से तथा उन्हें विद्यालय आने-जाने वाले वाहन चालकों से भी समय-समय पर उनके आचरण के बारे में जानकारी लेते रहना चाहिए, ताकि समय रहते उनकी गलत आदतों में सुधार किया जा सके।

पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ व्यवहारिक शिक्षा भी है जरूरी

आज के समय में देखा जाता है कि बच्चे स्कूल का गृहकार्य समाप्त करते ही खेलने में व्यस्त हो जाते हैं, जबकि माता-पिता उन्हें हर वक्त केवल पढ़ाई करने के लिए दबाव बनाते रहते हैं। यदि आपका बच्चा पढ़ाई में बहुत होशियार है, तो इसका यह मतलब नहीं होना चाहिए कि उस पर हर समय किताबी बोझ लाद दिया जाए। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को समाज, रिश्तों और दुनियादारी का व्यावहारिक ज्ञान होना भी उनके संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए बेहद आवश्यक है।

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