आज देशभर में धूमधाम से गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है, घरों और पंडालों में गणेशजी की स्थापना और पूजा-अर्चना की जा रही है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश चतुर्थी के दिन ही भगवान गणेश का जन्म हुआ था. लेकिन गणेश चतुर्थी से पहले राजधानी जयपुर स्थित मोती डूंगरी गणेश मंदिर में सिंधारा (सिंजारा) रस्म के लिए बड़ी संख्या में अविवाहित लाइन में लगने लगे हैं. सिंधारा जयपुर की पुरानी परंपरा है, जहां जन्म होने या शादी होने पर नए वस्त्र और मेहंदी चढ़ाई जाती है. मान्यता है कि मंदिर से मेहंदी प्रसाद प्राप्त करने और हाथों पर लगाने से विवाह संबंधी बाधाएं दूर होती हैं. इसी वजह से हर साल बड़ी संख्या में अविवाहित युवक-युवतियां यहां मेहंदी प्रसाद लेने पहुंचते हैं.
मेहंदी को लेकर भक्तों में विशेष आस्था
मंदिर के पुजारी ने बताया कि गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले सिंधारा (सिंजारा) की रस्म निभाई जाती है और इसी रस्म की मेहंदी को लेकर भक्तों में विशेष आस्था है. इस अवसर पर गणेशजी को विशेष पोशाक पहनाई जाती है और स्वर्ण मुकुट, नौलखा हार तथा चांदी के सिंहासन से सजाया जाता है. इसके बाद भगवान को चढ़ाए जाने के बाद मेहंदी भक्तजनों को दी जाती है. यहां केवल राजस्थान के ही नहीं बल्कि हरियाणा, गुजरात, पंजाब से भी युवक आते हैं. यह परंपरा अब गणेश चतुर्थी उत्सव का प्रमुख आकर्षण बन चुकी है.
हर मनोकामना होती है पूरी
मान्यता है कि मेहंदी सिधारे पर भक्त जो भी मनोकामना लेकर आते हैं, वह पूरी हो जाती है. मेहंदी का संबंध विवाह से होता है, इसलिए जो विवाह करने की सोच रहे हैं और जिनका विवाह काफी समय से नहीं हुआ है और जो विवाह योग्य हैं, अगर वे हाथों पर ये मेहंदी रचाते हैं, तो माना जाता है कि एक वर्ष के अंदर विवाह संपन्न हो जाता है. आज का असली प्रसाद मेहंदी ही है.
रस्म के लिए 3500 किलो मेहंदी आई
मंदिर के पुजारी ने बताया कि इस बार रस्म के लिए 3500 किलो मेहंदी आई है. देखा जा सकता है कि दर्शनार्थियों का तांता लगा हुआ है, 8 जगहों पर मेहंदी बांटी जा रही है. ऐसे में हमारी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को बांटी जाए और कोई भी खाली हाथ ना जाए. बता दें कि गणेश चतुर्थी से गणेश उत्वस का शुभारंभ होता है और अनंत चतुर्दशी के दिन इस पर्व का समापन होता है. सुख, शांत-समृद्धि और जीवन के संकट से दूर होने के लिए भगवान गणेश की पूजा की जाती है.
मोती डूंगरी गणेश मंदिर का इतिहास
मोती डूंगरी गणेश मंदिर जयपुर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है और इस गणेश मंदिर का इतिहास करीब 500 साल पुराना माना जाता है. मंदिर में स्थापित गणेशजी की प्रतिमा को लेकर मान्यता है कि इसे राजस्थान के मावली क्षेत्र से जयपुर लाया गया था. कहा जाता है कि एक बैलगाड़ी में प्रतिमा को जयपुर लाया जा रहा था और जहां बैलगाड़ी रुकी, वहीं भगवान गणेश की स्थापना करने का निर्णय लिया गया. बाद में मोती डूंगरी की पहाड़ी के नीचे मंदिर का निर्माण कराया गया. वर्तमान मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में सेठ जय राम पालीवाल के मार्गदर्शन में होने की बात कही जाती है. मंदिर की वास्तुकला और यहां होने वाले विशेष धार्मिक आयोजनों के कारण यह जयपुर की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया.

