विश्वास और संवाद का टूटना ही सभी संघर्षों को जन्म देता हैं. लेकिन जब किसी को यह महसूस होता है कि उसे समझा जा रहा है, तो वह सुनना शुरू करता है और सबसे कठोर हृदय भी धीरे-धीरे पिघलने लगता है. गहरी समझ यह है कि हर अपराधी के भीतर एक पीड़ित छिपा होता है, जो सहायता के लिए पुकार रहा होता है, एक ऐसी चोट जो देखभाल चाहती है. यदि आप उन्हें ठीक होने में सहायता करें और यह अनुभव दें कि उनकी बात को सुना जा रहा है तो अपराधी स्वतः ही विलीन हो जाता है.
सेवा और सुधार का वैश्विक अनुभव
हम आर्ट ऑफ लिविंग के ‘प्रिजनर रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम’ के अंतर्गत विश्व भर में सात लाख से अधिक कैदियों के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं. उनके जीवन में आया परिवर्तन किसी उपन्यास से कम नहीं. उदाहरण के लिए, डेनमार्क की एक जेल में हम अभ्यस्थ व आदतन अपराधियों, मादक पदार्थ के तस्करों और गिरोहों के सरगनाओं के उत्थान के लिए काम करते हैं. उनमें से कई एक कठोर, दबंग छवि लेकर चलते थे. लेकिन जब हमने उन्हें श्वास तकनीकों और ध्यान का अभ्यास करवाया और उनके साथ समय बिताया, तो वे मोम की तरह पिघल गए. भीतर से वे सभी अत्यंत कोमल और अच्छे हृदय वाले हैं, जिन्हें केवल उजागर होने का अवसर चाहिए.
करुणा, प्रज्ञा और वैराग्य का अंतर्संबंध
यदि आप मेरी दृष्टि से देखें, तो वे सभी सुंदर हैं. यह सब समझने, सुनने और करुणामय होने की बात है. करुणा कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे हम मांगें या जिसके लिए किसी के कहने का इंतजार करें. करुणा हमारा स्वभाव है, हमारी मूल प्रकृति. करुणा को सशक्त बनाए रखने के लिए उसके साथ दो और गुणों का होना आवश्यक है—प्रज्ञा और वैराग्य. यदि इनमें से कोई एक भी अनुपस्थित हो, तो करुणा अपनी शक्ति खो देती है. प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति करुणामय होते हुए भी विरक्त कैसे रह सकता है.
कर्म का बंधन और अज्ञान का बोध
जब आप करुणा को कर्म के दृष्टिकोण से देखते हैं, तब आप घटनाओं की न्याय-अन्याय की उलझनों में नहीं फंसते. कर्म के तरीके अत्यंत विचित्र हैं. वही लोगों को मिलाता है और अलग भी करता है. वही किसी को दुर्बल और किसी को शक्तिशाली बनाता है, किसी को समृद्ध और किसी को अभावग्रस्त. संसार का समस्त संघर्ष, किसी भी रूप में, कर्म का बंधन है. कर्म तर्क और कारण से परे है. यह समझ आपको भावनात्मक उलझनों से ऊपर उठाती है और आत्मा की यात्रा में सहायक बनती है.
यहां करुणा के भी दो रूप हैं. एक ज्ञानी की करुणा और दूसरी अज्ञान से उपजी करुणा. अज्ञानी व्यक्ति की करुणा केवल दुख के प्रति सहानुभूति पर आधारित होती है, जबकि ज्ञानी दुख के पार देखता है. वह उस अज्ञान को देखता है जिसने कर्म और उसके परिणाम को जन्म दिया. दुख कर्म के कारण आता है और यदि हम कर्म को मानते हैं, तो करुणा का स्थान क्या है? हर व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगता है. इसी प्रकार, वैराग्य के बिना करुणा भी सीमित हो जाती है. चिकित्सकों और नर्सों को देखें. वे पूर्ण समर्पण से सेवा करते हैं, पर भावनात्मक रूप से उलझते नहीं. यदि वे अत्यधिक आसक्त हो जाएं, तो उनका विवेक धुंधला हो जाएगा और उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होगी. वैराग्य ही उन्हें स्पष्टता देता है, विशेषकर कठिन परिस्थितियों में.
मानवीय प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना
अक्सर लोग करुणा को एक कर्म या व्यवहार मानते हैं. यह समझना आवश्यक है कि करुणा आपका स्वभाव है. वास्तव में, करुणा और अहिंसा मानवीय मूल्यों की प्रथम सीढ़ी हैं.फिर ऐसा क्यों है कि हम अपने भीतर की इस सहज प्रवृत्ति को अनुभव नहीं कर पाते? इसका कारण है कि हम अपने भीतर क्रोध, पूर्वाग्रह, आरोप और पछतावे को संजोए रखते हैं. ये सभी हमारे भीतर और आसपास नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं. यही नकारात्मकता हमारी करुणा के स्वाभाविक प्रवाह को रोक देती है. जब कोई घटना घटती है, तो हम उसे जैसा है वैसा स्वीकार नहीं करते. हम उसके पीछे कारण ढूंढ़ते हैं, उसे नाम देते हैं, और या तो स्वयं को दोष देते हैं या दूसरों को. जीवन भर हम एक पेंडुलम की तरह दूसरों को दोष देने और स्वयं को दोष देने के बीच झूलते रहते हैं. अक्सर हम मान लेते हैं कि किसी ने जानबूझकर हमें चोट पहुंचाई है, और फिर हम उसे क्षमा करने का प्रयास करते हैं.
गलती में करुणा नहीं तो प्रतिशोध की भावना
हम अपनी गलतियों की योजना नहीं बनाते. अधिकांश गलतियां जागरूकता के अभाव से होती हैं. यदि आप अपनी गलतियों की योजना नहीं बनाते, तो आप यह क्यों मानते हैं कि दूसरा व्यक्ति अपनी गलतियों की योजना बनाता है? हर गलती या तो अज्ञान से होती है या जागरूकता की कमी से. जब हम किसी की गलती के प्रति करुणा नहीं रखते, तो हम प्रतिशोध की ओर बढ़ते हैं और नकारात्मक भावनाओं के चक्र में बंध जाते हैं. क्षमा मन और आत्मा को हिंसा से बचाती है. लेकिन करुणा, क्षमा से भी आगे है. जब आप क्षमा करते हैं, तो आप सामने वाले को एक अपराधी के रूप में देखते हैं. जब आप करुणामय होते हैं, तो आप उस अज्ञान को पहचानते हैं जो उस गलती के पीछे है. जब आप ज्ञान और प्रज्ञा में स्थित होते हैं, तो आप संसार को एक अलग दृष्टि से देखते हैं, करुणा की दृष्टि से. अपने प्रति भी करुणा और दूसरों के प्रति भी. यदि आप स्वयं के प्रति कठोर हैं, तो वही कठोरता आप दूसरों पर भी प्रक्षेपित करेंगे.
प्रशंसा में विस्तार
जब आप छोड़ना सीखते हैं, तो मन वर्तमान में स्थिर होता है और अधिक सजग बनता है. आप पाएंगे कि आप अधिक मुस्कुरा रहे हैं, अधिक सहजता से प्रसन्न हो रहे हैं. जब मन में स्पष्टता, हृदय में पवित्रता और कर्म में सच्चाई होती है, तो करुणा स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है. आध्यात्मिक साधनाएं इन गुणों को भीतर विकसित करने में सहायक होती हैं. क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब कोई आपकी प्रशंसा करता है, तो आपके भीतर कुछ विस्तार होता है, और जब कोई अपमान करता है, तो वही कुछ सिकुड़ जाता है? जब आप एक पिल्ले को देखते हैं, या सूर्योदय अथवा सूर्यास्त को, तो भीतर एक सुंदर विस्तार का अनुभव होता है. ध्यान हमें उसी विस्तार और विस्मय की अवस्था में बनाए रखता है, चाहे बाहर कुछ भी घट रहा हो. जब हम इस विस्तृत अवस्था में जीते हैं, तो करुणा सहज रूप से प्रवाहित होती है.
हम स्वयं करुणा हैं
मुझसे एक बार पूछा गया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में हमें वास्तव में मानव क्या बनाता है. हमारा प्रेम, हमारी करुणा और हमारी अभिव्यक्ति की क्षमता, जो हमारे अस्तित्व के मूल से आती है, हमें विशिष्ट बनाती है. हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम जहां हैं, वहां अपनेपन का अनुभव करते हैं, या हम एक औपचारिक दुनिया में जी रहे हैं, औपचारिकताओं में बंधे हुए? इस प्रक्रिया में हम जीवन का रस और अपनत्व खो देते हैं. यह कोई और हमारे लिए नहीं कर सकता. हमें स्वयं एक ऐसा संसार बनाना होगा, जो हमारा हो और जिसमें हम स्वयं को अपना महसूस करें. तब हम यह अनुभव करते हैं कि करुणा कोई अलग अस्तित्व नहीं है, क्योंकि हम स्वयं करुणा हैं. आप अपने दाएं हाथ के प्रति करुणामय होने की बात नहीं करते, क्योंकि वह आपका ही हिस्सा है. याद रखें, जो आपका है, वह सदा आपका ही रहेगा. करुणा और प्रेम आपकी प्रकृति हैं और ये हमेशा आपके भीतर विद्यमान रहेंगे.

