नई दिल्ली। आज दुबई और अबू धाबी आधुनिकता, गगनचुंबी इमारतों, तेल की दौलत और वैश्विक कारोबार का प्रतीक हैं, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो इसकी तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। एक दौर ऐसा भी था जब आज का यूएई भारतीय उपमहाद्वीप की प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ा था। तब न यूएई नाम का कोई देश अस्तित्व में था और न ही दुबई की चमक-दमक, बल्कि यह पूरा इलाका ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन ‘ट्रूशियल स्टेट्स’ कहलाता था और इसका बाम्बे से रिश्ता जुड़ा था।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 19वीं और 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में फारस की खाड़ी का यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता था। समुद्री रास्तों की सुरक्षा, व्यापार और साम्राज्य के विस्तार के लिहाज से ब्रिटेन के लिए यह इलाका काफी अहम था। इस कारण ब्रिटिश हुकूमत ने इन क्षेत्रों का संचालन करना ज्यादा सुविधाजनक समझा। बॉम्बे प्रेसिडेंसी के तहत नियुक्त ब्रिटिश रेज़िडेंट दुबई, शारजाह, अबू धाबी और आसपास के इलाकों से जुड़े प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों में निर्णायक भूमिका निभाता था। स्थानीय शासकों और ब्रिटिश सरकार के बीच होने वाले कई अहम समझौते भी बॉम्बे से ही संचालित होते थे।
रिपोर्ट के मुताबिक दुबई और भारत के रिश्ते केवल प्रशासनिक नहीं थे, बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी बेहद मजबूत थे। उस समय खाड़ी क्षेत्र में तेल की खोज नहीं हुई थी और दुबई की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मोती के व्यापार पर निर्भर थी। खाड़ी से निकाले गए मोती बॉम्बे के बंदरगाहों के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचते थे। इस व्यापार में गुजराती, कच्छी और सिंधी व्यापारी अहम भूमिका निभाते थे, जिनकी मौजूदगी दुबई के बाजारों में दिखाई देती थी। यही वजह थी कि दुबई की गलियों में गुजराती और हिंदी भाषा आम सुनाई देती थी।
उस दौर में दुबई में भारतीय रुपया ही प्रचलित मुद्रा था। बाद में इसे ‘गल्फ रुपया’ कहा जाने लगा, लेकिन इसकी जड़ें भारतीय वित्तीय व्यवस्था से ही जुड़ी थीं। व्यापार, मजदूरी और रोजमर्रा के लेन-देन भारतीय रुपए में ही होते थे। बैंकिंग और कर्ज से जुड़े मामलों के लिए भी दुबई के कारोबारी बॉम्बे आते थे। संचार व्यवस्था में भी भारत की भूमिका अहम थी। डाक टिकट भारतीय होते थे और पत्राचार बॉम्बे के रास्ते ही होता था। कई मामलों में ब्रिटिश इंडिया के कानून और प्रशासनिक नियम इन इलाकों में लागू किए जाते थे।
सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी भारत की छाप गहरी थी। बड़ी संख्या में भारतीय व्यापारी, मजदूर और कारीगर दुबई में रहने लगे थे। मंदिर, गुरुद्वारे और भारतीय त्योहारों की मौजूदगी उस दौर में भी देखी जा सकती थी। यही कारण है कि आज भी दुबई में भारतीय समुदाय सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है, जिसकी जड़ें सौ साल से ज्यादा पुरानी हैं। 1947 में भारत की आज़ादी और 1971 में यूनाइटेड अरब एमिरेट्स (यूएई) के गठन के साथ यह सीधा प्रशासनिक रिश्ता इतिहास बन गया। तेल की खोज ने दुबई की तकदीर बदल दी और यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार व पर्यटन का केंद्र बन गया। यही साझा विरासत आज भारत और यूएई के रिश्तों को केवल कूटनीतिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और भावनात्मक मजबूती भी देती है।

