1448 साल से चल रही कंपनी, आखिर कैसे एक परिवार ने पीढ़ियों तक बचाए रखी अपनी विरासत?

नई दिल्ली। दुनिया में कारोबार करने वाली कंपनियों की संख्या करोड़ों में है, लेकिन इनमें से कुछ कंपनियों का इतिहास इतना पुराना है कि उनकी शुरुआत आज से कई सदियां पहले हुई थी। जापान की कोंगो गुमी ऐसी ही कंपनी है, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी लगातार चलने वाली कंपनी माना जाता है। इसकी स्थापना सन् 578 में हुई थी और लगभग 1,448 साल बाद भी इसका नाम कारोबारी दुनिया में मौजूद है। खास बात यह है कि कंपनी की शुरुआत जिस काम से हुई थी, उससे इसका रिश्ता आज भी जुड़ा हुआ है। कोंगो गुमी का प्रमुख काम बौद्ध मंदिरों के निर्माण और उनकी मरम्मत से रहा है। हालांकि अब यह स्वतंत्र पारिवारिक कंपनी नहीं, बल्कि एक बड़े कंस्ट्रक्शन ग्रुप की सहायक कंपनी के रूप में काम कर रही है।

बौद्ध मंदिर के निर्माण से हुई थी शुरुआत

कोंगो गुमी की कहानी जापान के छठी सदी के इतिहास से जुड़ी है। सन् 578 में शिगेमित्सु कोंगो ने इस कंपनी की नींव रखी थी। वह कोरियाई मूल के थे और उन्हें जापान में बौद्ध धर्म से जुड़े एक महत्वपूर्ण निर्माण कार्य की जिम्मेदारी मिली थी। उन्हें ओसाका में शितेनो-जी मंदिर के निर्माण का काम सौंपा गया था, जिसे जापान का पहला आधिकारिक बौद्ध मंदिर बताया जाता है। मंदिर निर्माण से शुरू हुआ यह कारोबार धीरे-धीरे आगे बढ़ा और कंपनी ने धार्मिक इमारतों के अलावा महलों समेत दूसरे निर्माण कार्यों में भी अपनी विशेषज्ञता हासिल की। कई पीढ़ियों तक कोंगो परिवार के सदस्य ही कंपनी की कमान संभालते रहे और इसी वजह से यह कारोबार सदियों तक एक ही परिवार के भीतर चलता रहा।

चुनौतियों का सामना और पारिवारिक परंपरा

कंपनी का इतिहास केवल सफलता की कहानियों से ही नहीं, बल्कि कई बड़े संकटों से भी भरा रहा है। इतिहास के अलग-अलग दौर में जापान में आए भीषण भूकंपों, आगजनी, युद्धों और राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद यह कंपनी बची रही। कोंगो परिवार ने इस कारोबार को बचाए रखने के लिए कई अनूठी परंपराएं बनाईं। उदाहरण के लिए, कंपनी की कमान केवल बड़े बेटे को देने के बजाय परिवार के सबसे योग्य सदस्य को सौंपी जाती थी, फिर चाहे वह दामाद ही क्यों न हो। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब मंदिरों का निर्माण रुक गया, तब कंपनी ने ताबूत बनाने का काम शुरू कर दिया था ताकि कारोबार चलता रहे।

आधुनिक दौर में बड़ा बदलाव

20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत में कंपनी को गहरे वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा। 1980 के दशक में जापान में प्रॉपर्टी के दामों में आई भारी तेजी के दौरान कंपनी ने कर्ज लेकर रियल एस्टेट में निवेश किया, लेकिन बाद में बाजार गिरने से कंपनी पर भारी कर्ज चढ़ गया। वहीं दूसरी ओर, आधुनिक समय में बौद्ध मंदिरों के निर्माण और मरम्मत की मांग में भी कमी आने लगी थी। इन सब वजहों से 2006 में कोंगो गुमी को वित्तीय तंगी के कारण एक बड़ी जापानी निर्माण कंपनी ने खरीद लिया।

आज भी कायम है सदियों पुरानी पहचान

स्वतंत्र कंपनी का दर्जा समाप्त होने के बाद भी कोंगो गुमी का नाम और उसका काम खत्म नहीं हुआ। इसे एक बड़े कंस्ट्रक्शन ग्रुप के तहत एक विशेष इकाई के रूप में आज भी संचालित किया जा रहा है। कंपनी के कारीगर आज भी वही पारंपरिक लकड़ी की नक्काशी और प्राचीन जापानी तकनीकों का इस्तेमाल करके बौद्ध मंदिरों और ऐतिहासिक इमारतों का रखरखाव करते हैं। चौदह शताब्दियों से अधिक का सफर तय करने वाली यह कंपनी आज भी दुनिया भर के उद्योग जगत के लिए निरंतरता और अनुकूलनशीलता की एक अनूठी मिसाल है।

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