बिना इंश्योरेंस के चल रहे 56% वाहन, ऐसी गाड़ी ने टक्कर मारी तो मुआवजा कौन देगा? जानें हादसे के बाद क्या करें

भारत में बड़ी संख्या में वाहन बिना वैध इंश्योरेंस के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब 30.4 करोड़ में से 16.5 करोड़ यानी 56 फीसदी वाहनों के पास वैध इंश्योरेंस नहीं है। ऐसे में यदि कोई बिना इंश्योरेंस वाला वाहन आपको टक्कर मार दे, तो इलाज और नुकसान का मुआवजा कौन देगा? इस स्थिति में पीड़ित को वाहन मालिक और ड्राइवर के खिलाफ मुआवजे का दावा करना होता है, जिसकी पूरी प्रक्रिया की जानकारी होना बेहद जरूरी है।

इलाज के दौरान रखें इन बातों का ध्यान

बिना इंश्योरेंस वाली गाड़ी से हादसे के बाद इलाज कराते समय सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि अस्पताल के रिकॉर्ड में इसे स्पष्ट रूप से सड़क हादसा दर्ज किया जाए। इसके बाद पीड़ित को मेडिको-लीगल केस (MLC) रिकॉर्ड, डिस्चार्ज समरी और सभी मेडिकल बिलों को सुरक्षित संभालकर रखना चाहिए।

घटना के बाद तुरंत पुलिस को सूचना दें और यदि संभव हो तो वाहन का नंबर, ड्राइवर तथा मालिक की जानकारी दें। पुलिस शिकायत में यह बात जरूर लिखवाएं कि टक्कर मारने वाले वाहन का इंश्योरेंस नहीं था।

दुर्घटनास्थल पर जुबानी समझौते से बचें

विशेषज्ञों के अनुसार, दुर्घटना वाली जगह पर कभी भी किसी भी तरह के जुबानी या मौखिक समझौते के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। चोट लगने, जान जाने, लापरवाही से गाड़ी चलाने, हिट-एंड-रन या बिना इंश्योरेंस वाले वाहन से जुड़े मामलों में तुरंत FIR दर्ज करानी चाहिए।

चूंकि ऐसी स्थिति में नुकसान की भरपाई के लिए कोई इंश्योरेंस कंपनी मौजूद नहीं होती, इसलिए मुआवजा सीधे तौर पर ड्राइवर और रजिस्टर्ड वाहन मालिक से वसूला जाता है। मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 की धारा 146 के तहत थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य है और बिना इंश्योरेंस के गाड़ी चलाना धारा 196 के तहत एक दंडनीय अपराध है।

मुआवजा पाने की पूरी प्रक्रिया और नियम

बिना इंश्योरेंस का वाहन होने पर आमतौर पर वाहन मालिक और हालात के मुताबिक ड्राइवर ही मुआवजे के लिए जिम्मेदार होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले के मुताबिक, आधिकारिक रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड में दर्ज वाहन मालिक ही मोटर दुर्घटना दावे के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होता है। यदि दुर्घटना के बाद वाहन की पहचान नहीं हो पाती है, तो मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 161 के तहत 'हिट एंड रन' योजना का सहारा लिया जा सकता है।

पीड़ित व्यक्ति पुलिस जांच पूरी होने का इंतजार किए बिना, मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 166 के अंतर्गत 'मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण' (MACT) में मुआवजे के लिए दावा पेश कर सकता है। यह दावा हादसे की जगह, पीड़ित के निवास स्थान या वाहन मालिक के क्षेत्र के ट्रिब्यूनल में किया जा सकता है। राहत की बात यह है कि MACT में किसी तरह की कोर्ट फीस नहीं लगती और जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी सहायता भी मिल सकती है।

मालिक पैसे देने से मना करे तो क्या करें?

यदि गाड़ी का मालिक मुआवजा देने से इनकार करे या भुगतान में देरी करे, तो मोटर वाहन अधिनियम की धारा 174 के तहत ट्रिब्यूनल से रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कराया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर दोषी की संपत्ति की कुर्की और नीलामी करके भी मुआवजे की रकम वसूल की जा सकती है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, मौत के मामलों में पीड़ित की उम्र, आय, भविष्य की संभावनाओं और आश्रितों की संख्या के आधार पर मुआवजा तय किया जाता है। वहीं, गंभीर चोट या विकलांगता के मामलों में स्थायी विकलांगता, भविष्य में कमाई का नुकसान, इलाज का खर्च, शारीरिक दर्द और देखभाल जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर मुआवजा राशि निर्धारित की जाती है।

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