Bilaspur High Court : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि रिश्वत की मांग साबित किए बिना केवल कथित रिश्वत की रकम बरामद होने के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती. न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने मुरली प्रसाद चौधरी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में 18 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया. अदालत ने सूरजपुर की विशेष अदालत द्वारा 30 मार्च 2017 को दी गई दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया.
Bilaspur High Court:स्कूल की मान्यता के लिए 15 हजार रुपये रिश्वत मांगने का आरोप
अभियोजन के अनुसार, मुरली प्रसाद चौधरी सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में लेखाकार के पद पर कार्यरत थे. एक स्कूल की मान्यता से जुड़े काम के लिए शिकायतकर्ता ने उनके खिलाफ रिश्वत मांगने की शिकायत की थी.
आरोप था कि शुरुआत में 15 हजार रुपये की मांग की गई थी। बाद में कथित रकम 8 हजार रुपये तय हुई. एंटी करप्शन ब्यूरो ने 30 जून 2014 को कार्रवाई करते हुए जाल बिछाया. अभियोजन का दावा था कि रासायनिक पदार्थ से चिन्हित 8 हजार रुपये आरोपी की पैंट की जेब से बरामद किए गए.
शिकायतकर्ता और गवाह के बयानों से बदला मामले का रुख
मुकदमे की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया. उसने अदालत में कहा कि आरोपी ने उससे रिश्वत की मांग नहीं की थी और उसने आरोपी को रिश्वत नहीं दी.
साथ गए गवाह ने भी अभियोजन के घटनाक्रम का समर्थन नहीं किया. उसके अनुसार, शिकायतकर्ता ने खुद रुपये आरोपी की जेब में रख दिए थे और आरोपी पैसे वापस लेने के लिए कह रहा था.
हाईकोर्ट ने इन बयानों को मामले के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना. अदालत के अनुसार, अभियोजन के गवाह रिश्वत की मांग से संबंधित आवश्यक तथ्य स्थापित नहीं कर पाए.
इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग पर भी उठे सवाल
अभियोजन ने कथित रिश्वत की मांग साबित करने के लिए बातचीत की इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग और उसके प्रतिलेख पर भरोसा किया था. हालांकि, जांच अधिकारी की जिरह के दौरान सामने आया कि रिकॉर्डिंग के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी का प्रमाण-पत्र पेश नहीं किया गया था.
इसके अलावा:
आरोपी की आवाज का नमूना नहीं लिया गया.
रिकॉर्डिंग की आवाज की वैज्ञानिक जांच नहीं कराई गई.
गवाहों ने कार्यालय के भीतर आरोपी और शिकायतकर्ता की वास्तविक बातचीत नहीं सुनी थी.
इन कमियों के आधार पर अदालत ने माना कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग के जरिए रिश्वत की मांग को कानून के अनुसार प्रमाणित नहीं किया गया.
सुप्रीम कोर्ट के नीरज दत्ता फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने नीरज दत्ता बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार), (2023) 4 SCC 731 में संविधान पीठ द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख किया.
फैसले में रिश्वत के मामलों में मांग और स्वीकार किए जाने अथवा प्राप्त किए जाने से जुड़े मूल तथ्यों को साबित करने के महत्व पर जोर दिया गया. अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी अनुमान का सवाल तभी उठता है, जब आवश्यक आधारभूत तथ्य साक्ष्यों के जरिए स्थापित हो जाएं.
केवल रकम बरामदगी से नहीं हो सकती दोषसिद्धि
हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में रिश्वत की मांग का प्रमाण अपराध का महत्वपूर्ण आधार है. यदि अभियोजन मांग को संदेह से परे साबित नहीं कर पाता, तो केवल कथित रूप से चिन्हित नोटों की बरामदगी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होगी.
अदालत ने वर्तमान मामले में पाया कि अभियोजन रिश्वत की मांग को प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा. इसलिए निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करते हुए दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया गया.
2017 की सजा निरस्त, आरोपी बरी
सूरजपुर की विशेष अदालत ने 30 मार्च 2017 को मुरली प्रसाद चौधरी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और धारा 13(1)(घ) के साथ धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया था.
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का आदेश निरस्त कर दिया और अपीलकर्ता को संबंधित आरोपों से बरी कर दिया। फैसले में जमानत बांड तथा जमा जुर्माना राशि के संबंध में भी निर्देश दिए गए हैं.

