Women’s Reservation Bill :साल 2014 के बाद यह पहला मौका है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बहुमत वाली सरकार को संसद में ऐसी चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ा है. भारी रणनीतिक तैयारी के बावजूद महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ा संशोधन प्रस्ताव गिर गया. इस हार को सत्ता पक्ष के लिए पचा पाना मुश्किल हो रहा है, यही वजह है कि अब इसका ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ा जा रहा है. बीजेपी के दिग्गज नेता अब एकजुट होकर विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में जुट गए हैं.
Women’s Reservation Bill:प्रियंका गांधी का सीधा वार
विपक्ष पर लग रहे ‘हिपोक्रेसी’ के आरोपों के बीच कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कमान संभाली. शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने सरकार की नीयत पर सवाल उठाए. प्रियंका ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं का भला चाहती है, तो वह 2023 में सर्वसम्मति से पास हुए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के मूल स्वरूप को वापस लाए. उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि सरकार बिना किसी पेचीदगी के पुराना बिल लाती है, तो पूरा विपक्ष उसका समर्थन करेगा और इसे 2029 से ही लागू किया जा सकेगा.
परिसीमन की आड़ में राजनीति का बड़ा खेल
विपक्ष का मुख्य विरोध आरक्षण को जनगणना और परिसीमन (Delimitation) से जोड़ने पर है. प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं का मानना है कि सरकार एक तीर से दो शिकार करना चाहती है. सरकार की योजना है कि सीटें बढ़ाकर महिलाओं को आरक्षण दिया जाए ताकि मौजूदा पुरुष सांसदों का वजूद खतरे में न पड़े. विपक्ष का आरोप है कि यह महिलाओं को हक देने की मंशा नहीं, बल्कि परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटों का समीकरण बदलकर सत्ता पर एकाधिकार जमाने की कोशिश है.
DMK और TMC के कड़े तेवर
इस सियासी लड़ाई में क्षेत्रीय दलों ने भी अपने पत्ते खोल दिए हैं. तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK ने मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में ही कोटा लागू करने के लिए संसद में प्राइवेट मेंबर बिल पेश कर हलचल मचा दी है. वहीं, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने स्पष्ट किया कि यदि इस बिल को 2011 की जनगणना के आधार पर लागू किया जाता है और परिसीमन से दूर रखा जाता है, तो वे महिलाओं को 50 प्रतिशत तक आरक्षण देने का समर्थन करेंगे.
पुरुषवादी सोच और राजनीतिक वजूद की लड़ाई
प्रियंका गांधी ने इस पूरे मामले को पुरुषवादी मानसिकता से जोड़ते हुए कहा कि सरकार मौजूदा सीटों पर आरक्षण इसलिए नहीं देना चाहती क्योंकि उसे अपने पुरुष सांसदों की नाराजगी का डर है. वर्तमान में देश के 21 राज्यों में बीजेपी या उनके सहयोगियों की सरकार है. ऐसे में परिसीमन होने पर जनसंख्या के आधार पर सीटों का जो नया बंटवारा होगा, वह पूरे देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को बिगाड़ सकता है. अब देखना यह है कि सरकार इस ‘चेक एंड मेट’ की स्थिति से कैसे निकलती है.

