FCRA Amendment Bill 2026 : लोकसभा में बुधवार को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA संशोधन बिल, 2026 पर चर्चा टलने पर विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरा है. 25 मार्च को सदन में पेश किए गए इस बिल का विपक्षी सांसदों ने कड़ा विरोध किया था, जिसके बाद भी बुधवार को इसे चर्चा के लिए नहीं लाया गया. सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती के स्वरूप को लेकर लाया गया बिल अधिक महत्वपूर्ण था, इसलिए उसे प्राथमिकता दी गई। हालांकि, विपक्ष सरकार के इस तर्क को मानने को तैयार नहीं हुआ.
केरल सांसदों के विरोध के कारण पीछे हटी सरकार -CPI
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के सांसद पी. संदोष कुमार ने सरकार के इस कदम को ‘रणनीतिक वापसी’ करार दिया है. उन्होंने दावा किया कि यह यहां सरकार का कोई हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है बल्कि केरल के सांसदों और जनता के निरंतर विरोध के कारण केंद्र को मजबूरी में पीछे हटना पड़ा है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस कानून के जरिए नागरिक समाज और विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित संस्थाओं पर नियंत्रण करना चाहती है.
क्या है FCRA और क्यों मचा है बवाल?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (FCRA) मुख्य रूप से गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को मिलने वाले विदेशी चंदे और आतिथ्य को रेगुलेट करने के लिए बनाया गया था. इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय हित के खिलाफ न हो. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लगभग 16,000 एसोसिएशन इस एक्ट के तहत पंजीकृत हैं, जिन्हें सालाना करीब 22,000 करोड़ रुपये का विदेशी फंड प्राप्त होता है.
इस बिल में प्रस्तावित बदलावों को लेकर विवाद तब गहरा गया जब विपक्ष ने इसे ‘लोकतंत्र विरोधी’ करार दिया. विपक्षी नेताओं का कहना है कि नए बदलावों के जरिए केंद्र सरकार को संस्थाओं, संपत्तियों और संगठनों की गतिविधियों पर कब्जा करने के लिए असीमित और अपारदर्शी अधिकार मिल जाएंगे. संदोष कुमार ने इसकी तुलना वक्फ बोर्ड के नियमों में किए जा रहे बदलावों से करते हुए कहा कि सरकार संसद को FCRA से जुड़ा पूरा डेटा देने से कतरा रही है.
विपक्ष का तीखा हमला
विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब अधिकांश सांसद चुनावी व्यस्तताओं के कारण अपने क्षेत्रों में हैं, तब इतने संवेदनशील बिल को पास कराने की कोशिश करना संसदीय जवाबदेही का अपमान है. पी. संदोष कुमार के अनुसार, यह रेगुलेशन के नाम पर सत्ता का केंद्रीकरण करने और सिविल सोसाइटी पर राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाने की एक कोशिश है. उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि यह अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के उनके वैचारिक प्रोजेक्ट का हिस्सा है.
केरल का जिक्र करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि वहां की जनता ने इस ‘साजिश’ को भांप लिया है. उन्होंने भाजपा नेताओं के बयानों को विभाजनकारी बताते हुए कहा कि संवैधानिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बचाने के लिए इस बिल का भविष्य में भी कानूनी और राजनीतिक रूप से कड़ा विरोध जारी रहेगा. फिलहाल, बिल के टलने से सरकार और विपक्ष के बीच तनातनी और बढ़ने के आसार हैं.

