Supreme Court on R’ape : देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कड़े कानूनों के बाद भी रे’प और यौन उत्पीडन ( sexual harassment) के मामलों मे कई खास कमी नहीं आई है. साल 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में हर दिन कम से कम 86 रेप होते हैं. इस मामले में एक बड़ी बात ये भी है कि आरोपी को दोषी करार दिये जाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि ज्यादातर मामलों में फैसले होने में सालों लग जाते हैं और इसे साबित करते करते पीडिता खुद कई बार पीछे हट जाती हैं क्योंकि इसे साबित करने के लिए महिलाओं को ही कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार को लेकर एक फैसला दिया है, जिसमें कहा कि यौन उत्पीड़न के मामले में शारीरिक चोटों का ना होना अपराध नहीं होने की पुष्टि नहीं करता है.
Supreme Court on R’ape : जरुरी नहीं कि पीडिया शोर मचाये
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ-साफ कहा है कि ये भी जरूरी नहीं है कि पीड़िता शोर मचाए या चिल्लाए. ऐसे मामलों में पीड़िताओं की प्रतिक्रिया परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है. कोर्ट ने ये भी कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में समाज में कलंक का डर ज्यादातर पीड़िताओं को घटना को सामने लाने में बाधाएं खड़ी करते हैं .
समाजिक कलंक का डर घटना के उजागर होने में बड़ी बाधा
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हृषिकेश रॉय और एसवीएन भट्टी की बेंच ने कहा कि ये एक मिथक है कि यौन उत्पीड़न के दौरान शारीरिक चोटें होनी चाहिए. पीड़ित कई तरीकों से मानसिक पीड़ा का सामना करते हैं. इस दौरान पीडित डर, आघात, सामाज में कलंक या मदद ना मिलने जैसी भावनाओं से वह प्रभावित हो सकती है. कोर्ट ने कहा कि ये बिल्कुल भी सही नहीं है कि हम सभी मामलों में एक तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद करें. यौन उत्पीड़न के मामले में कलंक जैसी भावनाएं अक्सर महिलाओं के लिए बाधाएं पैदा करती हैं. ऐसे मामलों में घटना को दूसरों से साझा कर पाना भी मुश्किल हो जाता है.
हैंडबुक ऑन जेंडर स्टिरियोटाइप्स (2023) का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में “हैंडबुक ऑन जेंडर स्टिरियोटाइप्स (2023)” का हवाला देते हुए कहा कि अलग-अलग लोग पीडा में अलग-अलग तरीके से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. उदाहरण के लिए एक व्यक्ति अपने माता-पिता की मृत्यु पर सबी के सामने रो सकता है, जबकि कोई दूसरा व्यक्ति उसी स्थिति में कोई भावना नहीं भी दिखा सकता है. इसी तरह एक अगर एक महिला के साथ यौन उत्पीड़न या बलात्कार की घटना होती है तो ये उनके व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वो कैसे रियेक्ट करती है.इस मामले में एक जैसा कोई सही या उचित तरीका नहीं है.
उत्तराखंड के एक मामले के बीच सुप्रीम कोर्ट ने दिया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने रेप के मामले मे आरोपी एक आरोपी का सजा निरस्त कर दिया. लड़के पर आरोप था कि उसने एक लड़की का कथित रूप से अपहरण कर शादी करने की कोशिश की. आरोपी दलिप कुमार उर्फ डली ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 29 मार्च 2013 के फैसले को चुनौती दी थी. कोर्ट ने आईपीसी की धाराओं 363 और 366-A के तहत आरोपी को दोषी ठहराया था.





