Sunday, July 5, 2026
Home Breaking News Iran–US War के बीच श्रीलंका का बड़ा फैसला:अमेरिका के युद्धक विमानों को...

Iran–US War के बीच श्रीलंका का बड़ा फैसला:अमेरिका के युद्धक विमानों को लैंडिंग से रोका, राष्ट्रपति बोले हम तटस्थत….

0
196
Iran-US War Srilanka
Iran-US War Srilanka

Iran-US War Srilanka : ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच श्रीलंका ने एक अहम रणनीतिक फैसला लेते हुए खुद को पूरी तरह तटस्थ घोषित किया है. श्रीलंका ने अमेरिका के युद्धक विमानों को अपनी जमीन पर उतरने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है.

Iran-US War Srilanka:अमेरिका ने दो बार मांगी इजाजत

श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके (President Anura Kumaraध ने संसद में खुलासा किया कि अमेरिका ने 4 और 8 मार्च को अपने दो लड़ाकू विमानों को दक्षिण-पूर्व स्थित मट्टाला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पर उतारने की अनुमति मांगी थी. दोनों ही अनुरोधों को उनकी सरकार ने खारिज कर दिया. राष्ट्रपति ने स्पष्ट कहा कि देश किसी भी दबाव में आकर अपनी तटस्थ नीति से समझौता नहीं करेगा.

“दबाव में नहीं झुकेंगे” – राष्ट्रपति

राष्ट्रपति दिसानायके ने कहा कि मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष चुनौतियां जरूर पैदा कर रहा है लेकिन श्रीलंका अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखेगा. उन्होंने यह भी बताया कि ये विमान जिबूती स्थित सैन्य अड्डे से आ रहे थे और एंटी-शिप मिसाइलों से लैस थे.

अमेरिका के साथ बातचीत भी जारी

यह बयान अमेरिका के विशेष दूत सर्जियो गोर के साथ हुई बैठक के एक दिन बाद आया.दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग को लेकर चर्चा हुई है.

ईरानी जहाजों को मानवीय मदद

दिलचस्प बात यह है कि जहां एक ओर श्रीलंका ने अमेरिका को सैन्य उपयोग की अनुमति नहीं दी, वहीं दूसरी ओर उसने ईरान के जहाजों को मानवीय आधार पर सहायता दी.

  • 4 मार्च को ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर हमले के बाद श्रीलंका ने राहत और बचाव अभियान चलाया

  • कई नाविकों को बचाकर इलाज कराया गया

  • मृत सैनिकों के शव सम्मान के साथ ईरान भेजे गए

इसके अलावा, एक अन्य ईरानी जहाज IRIS Bushehr को तकनीकी खराबी के चलते मदद दी गई और उसे सुरक्षित स्थान पर भेजा गया.

संतुलन साधने की रणनीति

श्रीलंका का यह रुख साफ संकेत देता है कि वह वैश्विक तनाव के बीच किसी भी पक्ष में खड़े होने से बच रहा है.जानकार मानते हैं कि यह कदम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया है.