Hormuz Oil-LPG Crisis : अमेरिका- ईरान युद्ध खत्म होने के बाद पूरी दुनिया समेत बारत को भी उम्मदी है कि अब जल्द ही तेल संकट से उबरने में मदद मिलेगी. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से याता यात शुरु होने के बाद अब तेल और गैस से भरे टैकरों का आवागमन सुचारु रुप से होने लगेगा लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में यातायात शुरु होने के बाद भारत को जोर का झटका लगी है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखने के लिए तो मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ तेल ढोने वाले जहाजों की भारी कमी ने भारत समेत कई देशों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. हालात ऐसे हैं कि फारस की खाड़ी से भारत तक कच्चा तेल लाने वाले एक बड़े टैंकर का किराया सामान्य दर से करीब 9 गुना अधिक पहुंच गया है.
Hormuz Oil-LPG Crisis:युद्ध विराम के बाद भी खत्म नहीं हुआ संकट
अमेरिका-ईरान समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव जरूर कम हुआ है और जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है, लेकिन संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. अब नई चुनौती जहाजों की उपलब्धता को लेकर सामने आई है. दक्षिण कोरिया की शिपिंग कंपनी सिनोकोर द्वारा हाल ही में किए गए एक बड़े टैंकर सौदे ने इस समस्या को उजागर कर दिया है. बताया जा रहा है कि करीब 20 लाख बैरल तेल क्षमता वाले जहाज के लिए रिकॉर्ड स्तर का किराया चुकाया गया है.
दरअसल, मार्च 2026 में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण होर्मुज क्षेत्र से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई थी. यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्ग माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है. उस समय सुरक्षा जोखिम बढ़ने के कारण कई जहाज दूसरे क्षेत्रों में चले गए थे और बीमा कंपनियों ने भी जोखिम उठाने से इनकार कर दिया था.
आखिर इतना महंगा क्यों हुआ जहाज किराया?
अब जबकि हालात कुछ सामान्य हुए हैं, तेल कंपनियां फिर से खाड़ी देशों से आपूर्ति बढ़ाना चाहती हैं, लेकिन पर्याप्त जहाज उपलब्ध नहीं हैं. ओमान की खाड़ी में एक सप्ताह के भीतर सीमित संख्या में ही खाली टैंकर पहुंच पा रहे हैं. मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने के कारण जहाज मालिक मनचाहा किराया वसूल रहे हैं.
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज?
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा होता है. विशेष रूप से एलपीजी आयात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आता है. हालांकि भारत सरकार और तेल कंपनियों ने इस जोखिम को पहले ही भांप लिया था. इसी रणनीति के तहत रूस से तेल आयात लगातार बढ़ाया गया है. जून 2026 में रूस से भारत का तेल आयात रिकॉर्ड 26 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो कुल आयात का 53.5 प्रतिशत है. इसके अलावा उत्तरी अमेरिका और वेनेजुएला जैसे वैकल्पिक स्रोतों से भी तेल खरीदा जा रहा है.
राहत की बात यह है कि भारत के कई जहाज और नाविक सुरक्षित रूप से इस मार्ग को पार कर चुके हैं. विदेश मंत्रालय के अनुसार अमेरिका-ईरान समझौते के बाद भारत आने वाले 11 जहाज सुरक्षित रूप से होर्मुज मार्ग से गुजर चुके हैं.
आम आदमी पर क्या होगा असर?
आम लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर असर का है. फिलहाल ब्रेंट क्रूड करीब 73 डॉलर प्रति बैरल तक गिर चुका है, जिससे कुछ राहत मिली है लेकिन यदि जहाजों की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो तेल कंपनियों की लागत बढ़ सकती है. ऐसे में आयात बिल, रुपए की मजबूती और ईंधन कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.
फिलहाल स्थिति यह है कि तेल के दाम कम होने के बावजूद उसे भारत तक पहुंचाना महंगा हो गया है. आने वाले हफ्तों में जहाजों की उपलब्धता सामान्य होती है या नहीं, इसी पर तय होगा कि देश को राहत मिलेगी या यह नई समुद्री चुनौती और बड़ी आर्थिक चिंता में बदल जाएगी.

