जेल से नहीं चलेगी सरकार! JPC की बड़ी सिफारिश-30 दिन हिरासत में रहने पर जाएगी PM, CM और मंत्रियों की कुर्सी

JPC report On PM CM resignation rule नई दिल्ली: देश में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के लंबे समय तक न्यायिक हिरासत या जेल में रहने के बाद उन्हें पद से हटाने से जुड़े कानून में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. संसद की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने इस संबंध में लाए जा रहे 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार कर ली है, जिसमें कई महत्वपूर्ण और दूरगामी संशोधन सुझाए गए हैं. जेपीसी ने साफ तौर पर अपने सुझाव में कहा है कि लोकतंत्र में ‘जेल से सरकार नहीं चलनी चाहिए.’

हालांकि, समिति ने कानून के संभावित राजनीतिक दुरुपयोग को रोकने के लिए एक बड़ा संतुलन बनाने का भी प्रयास किया है. जेपीसी ने विधेयक में ‘सनसेट क्लॉज’ (एक निश्चित समय सीमा के बाद कानून का स्वतः समाप्त होना या समीक्षा होना) की सिफारिश की है. इसके साथ ही, मंत्रियों को हमेशा के लिए हटाने के बजाय केवल ‘अस्थायी तौर पर’ पद से मुक्त करने का सुझाव दिया है, ताकि जो नेता बाद में निर्दोष पाए जाएं, उन्हें हमेशा के लिए अपने पद से हाथ न धोना पड़े.

JPC report On PM CM resignation rule: हिरासत के 31वें दिन स्वतः चली जाएगी कुर्सी

विधेयक के नए प्रस्तावित प्रावधानों के मुताबिक, यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गिरफ्तारी के बाद 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसके अगले ही दिन यानी 31वें दिन उसे अपना पद छोड़ना होगा. नियमों के तहत प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री संबंधित राज्यपाल, उपराज्यपाल या राष्ट्रपति से उस मंत्री को हटाने की सिफारिश करेंगे. यदि संबंधित नेता खुद इस्तीफा नहीं देते हैं, तो उन्हें मंत्रिपरिषद से स्वतः हटा हुआ मान लिया जाएगा.

सदस्यता रहेगी सुरक्षित 

इस संशोधन की सबसे बड़ी बात यह है कि इससे नेताओं की सांसद या विधायक (MP/MLA) की सदस्यता पर कोई आंच नहीं आएगी, वे केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री का कार्यकारी पद छोड़ेंगे. जब तक जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत वे अयोग्य घोषित नहीं होते, तब तक वे चुने हुए जनप्रतिनिधि बने रहेंगे.

पुलिस हिरासत से छूटने के बाद पद मिलेगा वापस 

राजनीतिक प्रतिशोध या गलत आरोपों के कारण पद गंवाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए जेपीसी ने ‘घर वापसी’ का रास्ता खुला रखा है. समिति ने स्थायी रूप से पद से हटाने के बजाय अस्थायी निलंबन का प्रावधान रखा है. यदि संबंधित मंत्री तय समय सीमा के भीतर अदालत से बरी हो जाते हैं, छूट जाते हैं या अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई नहीं करता है, तो वे दोबारा अपने पद (प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री) पर बहाल हो सकेंगे.

इसके साथ ही समिति ने यह भी साफ किया है कि यह नियम केवल उन्हीं गंभीर मामलों में लागू होगा जिनमें न्यूनतम 5 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है. मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष फास्ट ट्रैक या विशेष अदालतें बनाने की भी सिफारिश की गई है.

संविधान के इन अनुच्छेदों में होगा संशोधन

जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संविधान के महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में बदलाव की सिफारिश की है:

  • केंद्र और राज्यों के लिए अनुच्छेद 75 और 164 में संशोधन।

  • केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के संदर्भ में अनुच्छेद 239AA में बदलाव।

  • यह प्रस्तावित संशोधन जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 और पुड्डुचेरी यूटी एक्ट 1963 पर भी समान रूप से लागू होगा।

  • हालांकि, सांसदों और विधायकों की अयोग्यता से जुड़े अनुच्छेद 102 और 191 में इससे कोई परिवर्तन नहीं होगा।

क्या मानसून सत्र में बिल पास करा पाएगी सरकार?

सूत्रों के मुताबिक, संयुक्त संसदीय समिति 17 जुलाई को होने वाली अपनी आगामी बैठक में इस रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से पारित कर सकती है. जेपीसी से मंजूरी मिलने के बाद इस विधेयक को दोबारा केंद्रीय कैबिनेट के पास भेजा जाएगा. मोदी सरकार कैबिनेट से इसे दोबारा पास कराने के बाद 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के आगामी मानसून सत्र में पेश कर सकती है.

चूंकि अधिकांश विपक्षी दल इस विधेयक का शुरुआत से ही विरोध कर रहे हैं और उन्होंने जेपीसी में अपने सदस्य भी नामित नहीं किए थे, इसलिए संसद में इस पर भारी हंगामे के आसार हैं. यह एक संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे दोनों सदनों में पारित कराने के लिए सरकार को दो-तिहाई (2/3) बहुमत की आवश्यकता होगी, जो विपक्ष के कड़े रुख को देखते हुए एक बड़ी विधायी चुनौती साबित हो सकता है.

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