ईरान के संग लड़ने में खाली हुआ अमेरिकी हथियारों भंडार,चीन के लिए रखी मिसाइलें तेहरान पर दागीं

Iran-US War : वॉशिंगटन के गलियारों और पेंटागन के अंदरूनी कमरों में इन दिनों गहरी चिंता का माहौल है.ईरान के साथ चल रहे भीषण सैन्य संघर्ष ने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति, अमेरिका के शस्त्रागार की चूलें हिला दी हैं. ताज़ा रिपोर्ट्स और सैन्य आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि ईरान के खिलाफ मोर्चा खोलने की अमेरिका को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है. इस युद्ध ने अमेरिकी सैन्य आपूर्ति और हथियारों के स्टॉक को उस खतरनाक स्तर पर ला खड़ा किया है, जिसकी कल्पना कुछ महीनों पहले तक ट्रंप ने नहीं की थी.

Iran-US War :चीन को झुकाने वाला ‘प्लान’ पड़ा कमजोर

सबसे चौंकाने वाली जानकारी अमेरिका की लंबी दूरी की ‘स्टील्थ क्रूज मिसाइलों’ को लेकर आई है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने इन मिसाइलों का एक बड़ा हिस्सा भविष्य में चीन के साथ संभावित महायुद्ध के लिए आरक्षित रखा था. हालांकि, फरवरी के अंत से शुरू हुई इस जंग में अमेरिका ने अपने कुल भंडार की लगभग आधी स्टील्थ मिसाइलें तेहरान पर दाग दी हैं. पेंटागन के अंदरूनी अनुमानों के मुताबिक, अब इन मिसाइलों का स्टॉक इतना कम हो गया है कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका की सुरक्षा क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं.

टॉमहॉक और पैट्रियट मिसाइलों पर अंधाधुंध खर्च

युद्ध के मैदान में इस्तेमाल हो रहे संसाधनों के आंकड़े डराने वाले हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, अमेरिका अब तक 1,100 से अधिक लंबी दूरी की मिसाइलें और 1,000 से ज्यादा ‘टॉमहॉक’ क्रूज मिसाइलें दाग चुका है. एक अकेले टॉमहॉक मिसाइल की कीमत लगभग $3.6 मिलियन (करीब 30 करोड़ रुपये) है। हैरानी की बात यह है कि अमेरिका साल भर में जितनी टॉमहॉक मिसाइलें खरीदता है, उससे 10 गुना ज्यादा उसने महज कुछ हफ्तों की जंग में खर्च कर दी हैं. वहीं, हवाई हमलों को रोकने के लिए 1,200 से अधिक ‘पैट्रियट इंटरसेप्टर’ भी दागे गए हैं, जिनमें से प्रति मिसाइल की लागत $4 मिलियन (33 करोड़ रुपये) से अधिक है.

खाली होते गोदाम और वैश्विक सुरक्षा का खतरा

मिसाइलों की इस भारी कमी को पूरा करने के लिए अमेरिका को अब एशिया और यूरोप के कमांड सेंटरों से हथियार मंगाने पड़ रहे हैं. पेंटागन और कांग्रेस के अधिकारी इस बात से चिंतित हैं कि ईरान के चक्रव्यूह में उलझकर अमेरिका अपनी ‘ग्लोबल सप्लाई’ को खत्म कर रहा है. इसका सीधा असर रूस और चीन के खिलाफ तैनात अमेरिकी मोर्चों पर पड़ रहा है. सैन्य विश्लेषकों का तर्क है कि यदि इस समय चीन ताइवान पर हमला करता है या रूस अपनी आक्रामकता बढ़ाता है, तो अमेरिका के पास उनका मुकाबला करने के लिए पर्याप्त संसाधनों की भारी कमी हो सकती है.

Latest news

Related news