वाराणसी टकसाल शूटआउट केस की इनसाइड स्टोरी, कैसे मिली आरोपियों को रिहाई

Varanasi Taksal Shootout Case : वाराणसी की एमपी/एमएलए स्पेशल कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के चर्चित टकसाल सिनेमा शूटआउट मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. करीब दो दशक से अधिक समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद, कोर्ट ने विधायक अभय सिंह, विनीत सिंह और अन्य आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बाइज्जत बरी कर दिया. न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने अपने 79 पन्नों के आदेश में पुलिस की विवेचना और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर कड़े सवाल खड़े किए हैं.

Varanasi Taksal Shootout Case की कहानी 

यह पूरी कहानी 4 अक्टूबर 2002 की शाम शुरू हुई थी, जब वाराणसी के कैंट थाना क्षेत्र में स्थित टकसाल सिनेमा के पास अंधाधुंध फायरिंग हुई. उस वक्त जौनपुर के निर्दलीय विधायक धनंजय सिंह ने आरोप लगाया था कि अभय सिंह और उनके साथियों ने उन पर जानलेवा हमला किया. इस हमले में धनंजय सिंह के साथी संतोष सिंह बाबा गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उनकी एक आंख की रोशनी चली गई थी. पुलिस ने इस मामले में छह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी.

एक ‘H’ अक्षर ने कैसे बदला केस का रुख?

इस केस की सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण कड़ी धनंजय सिंह की सफारी गाड़ी का नंबर साबित हुई. धनंजय सिंह ने एफआईआर में अपनी गाड़ी का नंबर MH 04 B 5817 दर्ज कराया था। जब पुलिस ने इस नंबर की जांच की, तो पता चला कि यह नंबर महाराष्ट्र में पंजीकृत एक जेसीबी (JCB) मशीन का है. बाद में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि जल्दबाजी में नंबर लिखते समय वे ‘H’ अक्षर भूल गए थे और सही नंबर MH 04 BH 5817 था. हालांकि, धनंजय सिंह कोर्ट में इस गाड़ी के मालिकाना हक से जुड़े पुख्ता दस्तावेज पेश नहीं कर सके, जिसे कोर्ट ने वादी की बड़ी लापरवाही माना.

पुलिस की लापरवाही और गायब सबूत

अदालत ने इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सख्त टिप्पणी की. हैरानी की बात यह रही कि जिस सफारी गाड़ी पर ताबड़तोड़ गोलियां चलने का दावा किया गया, पुलिस ने उसे कभी ‘केस प्रॉपर्टी’ के तौर पर जब्त ही नहीं किया. गाड़ी का न तो फॉरेंसिक मुआयना हुआ और न ही कोई बैलिस्टिक जांच की गई. यहां तक कि घटनास्थल से गोलियों के कारण टूटे शीशों के टुकड़े तक बरामद नहीं किए गए. जांच में इन बुनियादी खामियों का सीधा फायदा आरोपियों को मिला.

पत्थर की आंख की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का पेच

ट्रायल के दौरान एक बेहद नाटकीय मोड़ तब आया जब गवाह संतोष सिंह ने कोर्ट के सामने अपनी पत्थर की नकली आंख निकालकर पेश की और दावा किया कि गोली लगने से उनकी असली आंख निकल गई थी. हालांकि, भावुक कर देने वाली इस गवाही के बावजूद वे कोर्ट में अपनी चोट से जुड़ी कोई आधिकारिक मेडिकल रिपोर्ट पेश नहीं कर पाए. इसके अलावा, गवाह के बयानों और पुलिस की डायरी में तारीखों का बड़ा विरोधाभास मिला, जिससे गवाही की विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई.

कोर्ट का फैसला और बरी होने का आधार

अभय सिंह के वकीलों ने कोर्ट में ‘एलिबाई’ (Alibi) का तर्क देते हुए साबित किया कि घटना के समय अभय सिंह वारदात वाली जगह से करीब 200 किलोमीटर दूर फैजाबाद के एक अस्पताल में भर्ती थे. कोर्ट ने पाया कि एफआईआर दर्ज करने के समय और मेडिकल मेमो की टाइमिंग में काफी विसंगतियां थीं. इन तमाम तकनीकी खामियों, पुलिस की लचर पैरवी और पुख्ता सबूतों की कमी को देखते हुए अदालत ने अभय सिंह, संदीप सिंह उर्फ पप्पू और संजय रघुवंशी समेत सभी को दोषमुक्त करार दिया.

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