Dhar Bhojshala Survey Report : मध्यप्रदेश के धार में आर्केल़ॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया यानी ASI ने भोजशाला सर्वेक्षण को लेकर 2000 पन्नों की रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी है. बताया जा रहा है कि इस रिपोर्ट में 37 हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां और अवशेष मिलने का जिक्र हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि भोजशाला की दीवारों, खिड़कियों और खंभों पर हिंदू भगवान गणेश , भगवान ब्रह्माजजी अपनी चारों पत्नियों के साथ ,नृसिंह, भैरव और अन्य देव देवताओं और पशु पक्षयों के चित्र उकेरे हुए देखे गये हैं.

Dhar Bhojshala Survey Report : लंबे समय से चल रहा है विवाद
मध्यप्रदेश के धार में बने भोजशाला को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है कि ये मंदिर है या मस्जिद..हिंदू पक्ष का दावा है कि ये एक हिंदु संरचना है.यहां मां सरस्वती की मूर्ति लगी थी जिसे हटाकर और जगह पर कब्जा करके इसे मस्जिद में तब्दील कर दिया गया था . इस मामले में मध्यप्रदेश हाइ कोर्ट ने 24 मार्च को भोजशाला में 500 मीटर के दायरे में वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दिया था. इसी आदेश के आधार पर ASI ने 98 दिनो तक सर्वे किया और अब 2000 पन्नों की अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी है
ASI सर्वे में इंडो-सासैनियन काल से लेकर मुगल काल तक के सिक्के मिले
ऐतिहासिक महत्व के इस भोजशाला के सर्वेक्षण के बाद ASI ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में कहा कि इस परिसर से चांदी, तांबे, एल्यूमीनियम और स्टील के कुल 31 सिक्के मिले हैं. ये सिक्के 10वीं – 11वीं सदी के बीच इंडो-सासैनियन काल से लेकर 13वीं-14वीं सदी के दिल्ली सल्तनत, 15वीं-16वीं सदी मालवा सुल्तान, 15वीं-16वीं सदी मुगल काल के हैं.
खिड़कियों और खंभों पर उकेरी गई थी देवी-देवताओं और पुशओं की आकृतियां
ASI रिपोर्ट में ये भी दावा है कि ये सिक्के तब के हैं, जब परमार राजा धार को अपनी राजधानी बनाकर मालवा में शासन कर रहे थे. सर्वे के दौरान यहां से कुल 94 मूर्तियां, मूर्तियों के टुकड़े और मूर्तिकला चित्रण के साथ वास्तुशिल्प भी मिले हैं. ये चित्र बेसाल्ट, संगमरमर, शिस्ट, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से बने हैं. खिड़कियों, खंभों में प्रयोग किये गये बीमों पर शस्रों से लैश देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई थीं. यहां दीवारों पर उकेरे गये चित्रों में भगवान गणेश, भगवान ब्रह्माजी अपनी चारों पत्नियों के साथ, नृसिंह, भैरव, देवी-देवता, मानव और पशु आकृतियां शामिल हैं. दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों में शेर, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, सांप, कछुआ, हंस जैसे कई पशु पक्षी के चित्र मिले हैं.
दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों को विकृत किया गया
मान्यता है कि कई स्थानों पर मस्जिदों में इंसान और जानवरों के चित्रों को उकेरने की अनुमति नहीं है, इसलिए ऐसे कई चित्रों को या तो तराश दिया गया है या विकृत कर दिया गया है. ASI के सर्वे मे ये बात भी निकल कर आई है कि पश्चिमी और पूर्वी स्तंभों में उकेरे गये चित्रों को विकृत करने के प्रयास किये गये हैं. पश्चिम की तरफ लिंटेल पर दक्षिण-पूर्व कक्ष में प्रवेश के लिए द्वार है. पश्चिमी स्तंभों में उकेरे गए इंसान , पशु या मिश्रित चेहरों वाले कीर्तिमुखों को नष्ट नहीं किया गया है. पश्चिम के मुकाबले उत्तर और दक्षिण की दीवारों में लगी खिड़कियों के फ्रेम और उनपर बने देवताओं की छोटी आकृतियां भी लगभग ठीक ठाक हालत में हैं.
यहां लगे शिलालेख इस जगह के शिक्षा केंद्र की परंपरा की ओर संकेत करते हैं.
ASI ने पाया है कि यहां मौजूद शिलालेख शिक्षा की परंपरा की ओर इशारा करते हैं. अभी वर्तमान में तो संरचना मौजूद हैं उसमें और उसके आस-पास पाए गए कई टुकड़ों पर उकेरे गये शिलालेख में एक समान पाठ शामिल है. इन शिलालेखों में सैकड़ों की संख्या में पद्य संख्याएं हैं, जिससे पता चलता है ही कि ये लंबी साहित्यिक रचनाएं थीं. पश्चिमी स्तंभ में दो अलग-अलग स्तंभों पर नागकामिका शिलालेख मिले है जो व्याकरण और शिक्षा से संबंधित हैं.
मान्यता है कि इस स्थान को राजा भोज ने बनवाया था
इन शिलालेखों के बारे में माना जाता है कि इसकी स्थापना राजा भोज के द्वारा की गई थी. एक शिलालेख में उकेरे गये छंदों में परमार वंश के राजा उदयादित्य के बेटे राजा नरवर्मन का वर्णन हैं. राजा नरवर्मण ने यहां 1094 से लेकर1133 ई तक शासन किया था. सर्वे कि मुताबिक भोजशाला में उकेरी गई सभी संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अरबी और फारसी शिलालेखों से पहले के हैं, जिससे ये स्पष्ट होता है कि संस्कृत और प्राकृत शिलालेख लिखने वालों लोग इस स्थान पर अरबी और फारसी लिखने वालों से पहले से मौजूद थे.इतिहास गवाह है कि भोजशाला की मूर्तियां को अब्दुल्ला शाह ने नष्ट करवा दिया था. रिपोर्ट में उल्लेख है कि खिलजी राजा महमूद शाह इस धर्म के केंद्र में एक भीड़ के साथ पहुंचा और हिंसक तरीके से मूर्तियों को नष्ट करके मंदिर को मस्जिद में तब्दील कर दिया .
ASI ने अपनी 2000 पन्नों की रिपोर्ट में ये कहा है कि शिलालेखों के बड़े स्लैब, स्तंभों पर नागकर्णिका आदि शिलालेखों आदि से पता चलता है कि साइट पर साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ी एक बड़ी संरचना मौजूद थी.

