Bihar DGP Appointment : बिहार की राजनीति में एक बार फिर सत्ता के संचालन और प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर बहस तेज हो गई है. जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) के बीच कथित खींचतान का मुद्दा उठाते हुए दावा किया है कि राज्य में फैसले लेने की असली ताकत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पास है. उन्होंने सवाल किया कि बिहार का अगला पुलिस महानिदेशक (DGP) कौन तय करेगा—सम्राट चौधरी या ललन सिंह?
पटना में शुक्रवार ( 9 अक्टूबर 2026) को मीडिया से बातचीत के दौरान प्रशांत किशोर ने बिहार की सत्ता व्यवस्था पर निशाना साधा. उनके बयान ने राज्य में प्रशासनिक नियुक्तियों और सरकार के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक चर्चा को हवा दी है. हालांकि, BJP और JDU के बीच DGP की नियुक्ति को लेकर किसी आधिकारिक टकराव की पुष्टि इन बयानों से नहीं होती.
Bihar DGP Appointment:’अमित शाह जो चाहेंगे, वही होगा’
प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया कि बिहार में प्रशासनिक फैसलों को लेकर असमंजस की स्थिति है. उन्होंने सवाल उठाया कि राज्य का DGP कौन नियुक्त करेगा और सरकार के कामकाज में किसकी भूमिका निर्णायक होगी.
पीके ने मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के संचालन को लेकर भी सवाल किए. उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले ‘डीके बॉस’ की भूमिका प्रभावी होगी या सम्राट चौधरी के प्रधान सचिव की.
प्रशांत किशोर के मुताबिक, बिहार की पूरी व्यवस्था केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चला रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि अंतिम फैसला अमित शाह की इच्छा के अनुसार होगा, न कि केवल सम्राट चौधरी के चाहने से.
प्रशांत किशोर ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद पर भी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि पिछले आठ से दस वर्षों में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं.
पीके ने बिहार में मतदान से पहले कथित तौर पर पैसे बांटकर वोट खरीदने के आरोप भी लगाए. उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है और जब तक चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, विरोध जारी रहेगा.
यह ध्यान रखना जरूरी है कि वोट खरीदने और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर लगाए गए आरोप प्रशांत किशोर के बयान का हिस्सा हैं. इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके आरोपों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. चुनाव आयोग की निष्पक्षता और SIR की प्रक्रिया को लेकर अन्य विपक्षी दल भी सवाल उठा रहे हैं.
चुनाव पर खर्च को लेकर सरकार पर तंज
बिहार में चुनावी खर्च और मतदाताओं को मिलने वाली आर्थिक सहायता के मुद्दे पर भी प्रशांत किशोर ने सरकार को घेरा. उन्होंने कहा कि पहले चुनावों में नेताओं की रणनीति लालू प्रसाद यादव के शासनकाल के ‘जंगलराज’ की आशंका दिखाकर वोट हासिल करने की होती थी, जबकि अब चुनावी मुकाबले में सरकार को बड़े पैमाने पर धन खर्च करना पड़ा.
पीके ने दावा किया कि उनके अभियान के कारण सरकार को ज्यादा मेहनत करनी पड़ी और बिहार के लोगों के सामने यह संदेश गया कि वे केवल पैसे के बदले वोट देने के बजाय शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर भी सवाल उठा सकते हैं.
उनके बयान में 10 हजार रुपये के बदले वोट मांगने और शिक्षा-रोजगार की मांग करने का जिक्र भी था. यह टिप्पणी मतदाताओं को प्रभावित करने के तरीकों पर उनकी राजनीतिक आलोचना का हिस्सा थी.
नीरज कुमार को लेकर भी प्रशांत किशोर का हमला
प्रशांत किशोर ने पटना स्नातक सीट से JDU के उम्मीदवार नीरज कुमार पर भी निशाना साधा. यह सीट आगामी विधान परिषद चुनाव के कारण चर्चा में है. नीरज कुमार JDU के उम्मीदवार हैं और पार्टी के भीतर उम्मीदवार को लेकर विवाद की खबरें भी सामने आई हैं.
पीके ने नीरज कुमार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह अपनी हैसियत से बढ़कर बोलने लगे थे और अब उनका राजनीतिक अंत सुनिश्चित कर दिया गया है. यह प्रशांत किशोर की तीखी राजनीतिक टिप्पणी थी.
उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से यह कह दें कि नीरज कुमार उनके साथ रहे हैं और उन्हें उनका समर्थन हासिल है, तो वह अपना उम्मीदवार वापस लेने को तैयार हैं.
बिहार की राजनीति में सत्ता और नेतृत्व पर बहस
प्रशांत किशोर के बयानों में तीन प्रमुख मुद्दे सामने आए हैं—DGP की नियुक्ति को लेकर खींचतान, राज्य की सत्ता व्यवस्था में केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल. इसके अलावा नीरज कुमार को लेकर उनकी टिप्पणी ने विधान परिषद चुनाव की चर्चा को भी राजनीतिक रंग दिया है.

