Rohtas School विद्यालय में छात्र-छात्राओं की संख्या शून्य,सरकार शिक्षक को बैठने की दे रही है सैलरी

रोहतास , सवांददाता मिथिलेश कुमार : बिहार के स्कूलों में शिक्षा के स्तर में सुधार लाने के लिए शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव लगतार मेनत कर रहे हैं, ऐसा हम लगातर देख और सुन रहे हैं लेकिन इतनी कड़ाई के बावजूद हकीकत कुछ और ही देखने को मिलती है.ताजा मामला Rohtas School करगहर प्रखंड क्षेत्र के राघोपुर गाँव के प्राथमिक विद्यालय से सामने आया है, जिसमें सरकार स्कूल के तीन शिक्षकों को सिर्फ स्कूल में बैठने के लिए सैलरी दे रही हैं, जबकि इस विद्यालय में छात्र-छात्राओं की संख्या शून्य है.

Rohtas तीन शिक्षक को सरकार सिर्फ विद्यालय में बैठने की सैलरी दे रही हैं.
                      Rohtas (तीन शिक्षक को सरकार सिर्फ विद्यालय में बैठने की सैलरी दे रही हैं)

पिछले वर्ष बगल के गाँव मचनडीह के कुछ बच्चों ने स्कूल में नाम दर्ज करवाया था. लेकिन अब स्कूल में पढ़ने के लिए एक भी बच्चे नहीं आते हैं. विद्यालय में एक भी छात्र  ना होने के बावजूद शिक्षकों पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं. कई रोहतास के इस स्कूल में तीन शिक्षक आ रहे हैं और अपना वेतन उठा रहे हैं. विद्यालय में प्रभारी प्रधानाध्यापिका के अलावा एक पुरुष एवं एक महिला सहायक अध्यापक तैनात हैं. मगर विद्यालय में पढ़ने के लिए एक भी बच्चा नहीं है.

Rohtas School : बच्चों को अंग्रेजी मीडियम पढ़ाना चाहते है अभिभावक

ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी स्कूलों ना तो शिक्षा का स्तर ठीक है ना ही सुविधाएं रहती है. बच्चों का भविष्य खराब करने से अच्छा है कि वो अपने बच्चों का दाखिला प्राइवेट स्कूल में करा दें. इसलिए ग्रामीण बच्चों का दाखिला  प्राइवेट स्कूल में कराते हैं. ग्रामीण कहते है कि सरकारी स्कूल में हिंदी मीडियम में पढ़ाई कराई जाती है और बच्चों को कंप्यूटर का ज्ञान देने की सुविधा नहीं है. इसलिए बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ने भेजते हैं. गांव के सभी परिवार सक्षम हैं और बच्चों को अंग्रेजी मीडियम के विद्यालय में पढ़ाना चाहते हैं.

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राघोपुर गाँव की आबादी करीब 200 है और सभी 30 परिवार संपन्न हैं. गाँव के लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की जगह प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के लिए भेजते हैं. इसलिए स्कूल में बच्चों का नाम दर्ज नहीं कराया जा रहा है. स्कूल के शिक्षक रोजाना बैठकर शाम को अपने घर चले जाते हैं.

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