भारत देश दुनिया में अपनी संस्कृति और प्राचीन काल के मंदिरों के लिए जानी जाती है. जहां 50 100 साल नहीं बल्कि हजारों साल पुराने मंदिर और एतिहासिक इमारतें आज भी मजबूती से खड़ी हैं. लेकिन सवाल कब तक वक्त के थपेड़ों के आगे जहां प्रकृति भी घुटने टेक देती है तो वहां ये मंदिर और इमारते क्या चीज हैं. तो इस बीच जो खबर आई वो जुड़ी है भगवान शिव के सबसे उंचे मंदिर पर मंडरा रहे खतरे से.
क्या है मामला?
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 12 हजार 800 फीट की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ शिव मंदिर झुक रहा है. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की तरफ से कराए स्टडी में यह बात निकलकर सामने आई है कि मंदिर में 5 से 6 डिग्री तक का झुकाव और परिसर के अंदर बने मूर्तियों और छोटे स्ट्रक्चर में 10 डिग्री तक का झुकाव देखने को मिला है.
ASI ने किया दावा
एएसआई अधिकारियों ने केंद्र सरकार को इस संबंध में जानकारी देते हुए संरक्षित इमारत के तौर पर शामिल किए जाने की सलाह दी है. इस पर अमल करते हुए सरकार ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कवायद भी शुरू कर दी है. एएसआई मंदिर में झुकाव की मुख्य वजह को जानने और संभव रिपेयर करने कोशिश करेगा. वैसे तुंगनाथ मंदिर के झुकाव से जुड़ी खबर पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों ने इन खबरों का खंडन किया है. देहरादून सर्कल के अधीक्षण Archeologist मनोज कुमार सक्सेना ने कहा कि मंदिर कितना झुका है, इसका किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से अध्ययन नहीं हुआ है. विशेषज्ञों ने ये जरूर कहा है कि सबसे ज्यादा ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के कुंड अपने स्थान से खिसक रहे हैं. इसके साथ ही मंदिर परिसर के निरीक्षण के बाद डिटेल प्रोग्राम तैयार किया जाएगा.
एएसआई के अधिकारी इसके साथ ही मंदिर की जमीन के नीचे के हिस्से के खिसकने या धंसने की आशंका को भी देख कर चल रहे हैं, जिसकी वजह से मंदिर में झुकाव होगा. उन्होंने बताया कि एक्सपर्ट्स से सलाह के बाद क्षतिग्रस्त नींव के पत्थरों को बदला जाएगा. फिलहाल एजेंसी ने ग्लास स्केल को फिक्स कर दिया, जो मंदिर की दीवार पर मूवमेंट को माप सकता है.
वैसे जानकारी के लिए बता दें तुंगनाथ मंदिर को दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है, दावा है कि 8वीं शताब्दी में कत्यूरी शासकों ने बनवाया था. यह बद्री केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) के प्रशासन के अधीन आता है. यह मंदिर 3680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना बताया जा रहा है.
वहीं ऐसा भी कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पाण्डवों ने भगवान शिव को खुश करने के लिए करवाया था. कहते हैं कि बैल के रूप भगवान शिव के हाथ दिखाई दिए थे, इसके बाद पाण्डवों के द्वारा तुंगनाथ मंदिर का निर्माण करवाया गया था. ‘तुंग’ मतलब हाथ और भगवान शिव के प्रतीक के रूप ‘नाथ’ शब्द से तुंगनाथ मंदिर नाम पड़ा था. हालांकि अभी ये मंदिर बद्री केदार मंदिर समिति (BKTC) के प्रशासन के तहत आता है। मंदिर में झुकाव के संबंध में एक लेटर बीकेटीसी को भी भेज दिया गया है.
BKTC ने खारिज किया ASI का प्रस्ताव
जिसे लेकदावार बीकेटीसी के अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने बताया इस मैटर को हाल ही में संपन्न हुए बोर्ड की मीटिंग में उठाया गया, जहां सभी लोगों ने एएसआई के प्रस्ताव को खारिज कर दिया. हम इस मंदिर को उसके वास्तविक स्वरूप में वापस लाने के लिए एसआई की सहायता करने को तैयार हैं. लेकिन हम उन्हें पूरी तरह से सौंपने के पक्ष में नहीं है. हम अपने निर्णय के बारे में सूचित कर देंगे. तो आपको क्या लगता है BKTC कमेटी का ये फ़ासिला ठीक है. क्योंकि यहाँ मामला सिर्फ मंदिर और आस्था का नहीं बल्कि भारत देश के इतिहास और गौरव का है.

