अंकारा। तुर्की की संसद में पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ हुए 10 वर्षों के 'मक्का पैक्ट' को लेकर जबरदस्त हंगामा खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन की सरकार पर निशाना साधते हुए तीखे सवाल किए हैं कि क्या भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होने की स्थिति में तुर्की पाकिस्तान का साथ देगा?
विपक्षी दलों ने जताई गहरी चिंता
कुर्द-समर्थक 'पीपल्स इक्वेलिटी एंड डेमोक्रेसी पार्टी' (DEM पार्टी) की डिप्टी ग्रुप लीडर गुलिस्तान किलिच कोचयिगित ने इस संयुक्त रक्षा समझौते का पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने दो टूक कहा कि अन्य देशों के भू-राजनीतिक हितों की खातिर तुर्की के नौजवानों को मौत के मुंह में नहीं धकेला जाना चाहिए। इसी तरह, İYİ पार्टी के सांसद लुत्फू तुर्ककान ने संसद में बोलते हुए कहा कि यह केवल तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा ताल्लुक तुर्की की राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और भविष्य के युद्ध खतरों से जुड़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मध्य पूर्व और भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बेहद अनिश्चित हैं, तो तुर्की खुद को 10 साल के लिए ऐसे बंधन में क्यों बांध रहा है जिससे आसानी से बाहर भी नहीं निकला जा सकता।
संसद में बहुमत से पास हुआ मक्का पैक्ट
तमाम विरोध के बावजूद तुर्की की संसद (ग्रैंड नेशनल असेंबली) में 5 नवंबर को हुए मतदान में मक्का पैक्ट विधेयक बहुमत से पास हो गया। संसद के 592 सदस्यों में से 398 ने मतदान में हिस्सा लिया, जिसमें 279 ने इसके पक्ष में और 119 ने विरोध में वोट डाला। राष्ट्रपति एर्दोगन की AK पार्टी और उसकी सहयोगी नेशनलिस्ट मूवमेंट पार्टी (MHP) के पास बहुमत होने के चलते यह बिल आसानी से पारित हो गया। सरकार पक्ष का तर्क है कि यह समझौता किसी देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए है।
क्या तुर्की सीधे भेज सकेगा अपनी सेना?
संसद से इस बिल के पास होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि तुर्की जब चाहे अपनी सेना सहयोगियों की मदद के लिए भेज सकता है। तुर्की के संविधान के अनुच्छेद-90 के तहत यह बिल सिर्फ कानूनी मान्यता के लिए पारित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद-92 के मुताबिक, यदि भविष्य में सेना भेजने की नौबत आती है, तो सरकार को इसके लिए संसद में अलग से प्रस्ताव लाकर मंजूरी लेनी होगी।

