बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में गिद्धों की सात प्रजातियां मौजूद, संरक्षण के प्रयास ला रहे रंग

उमरिया। मध्य प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की पहचान अब केवल बाघों की साहसिक दहाड़ों और हाथियों की मनमोहक चहलकदमी तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यहां के विस्तृत वनों में आसमान की ऊंचाइयों को छूते गिद्धों के बड़े-बड़े झुंड प्रकृति के सफल संरक्षण की एक नई और प्रेरणादायक गाथा लिख रहे हैं। कभी संपूर्ण देश में तीव्र गति से घटती आबादी के कारण गंभीर चिंता का विषय बने ये पक्षी अब बांधवगढ़ के सुरक्षित और प्राकृतिक आंचल में अपना नया आशियाना तलाश चुके हैं। यहां गिद्धों की संख्या में हो रही लगातार बढ़ोतरी वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक और बड़ी सफलता के रूप में देखी जा रही है।

तेजी से बढ़ती आबादी और ताजा आंकड़े

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र में गिद्धों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 के आरंभ में यहां कुल 172 गिद्ध पाए गए थे, जिनमें 159 बड़े और 13 छोटे गिद्ध शामिल थे। इसके पश्चात वर्ष 2024 में यह संख्या बढ़कर 300 तक पहुंच गई, और गत 24 मई 2026 को संपन्न हुई नवीनतम गणना में यह आंकड़ा छलांग लगाकर 388 पर पहुंच गया। इस ताजे आंकड़े में 358 बड़े और 30 छोटे गिद्ध शामिल हैं। महज छह वर्षों के अंतराल में गिद्धों की संख्या का दोगुने से भी अधिक हो जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बांधवगढ़ का पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक वातावरण इनके संरक्षण, संवर्द्धन तथा प्रजनन के लिए अत्यंत अनुकूल साबित हो रहा है।

सात विभिन्न प्रजातियों का प्राकृतिक बसेरा

बांधवगढ़ के जंगलों में ग्रीष्मकालीन और शरदकालीन गणना के दौरान पक्षी विशेषज्ञों द्वारा गिद्धों की कुल सात प्रमुख प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई है। इस विविधता में इंडियन वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, रेड हेडेड वल्चर, व्हाइट रंप्ड वल्चर, सिनेरियस वल्चर, हिमालयन ग्रिफन और यूरेशियन ग्रिफन जैसे पक्षी शामिल हैं। इनमें से कई प्रजातियां जहां पूरे वर्ष इस क्षेत्र में स्थायी रूप से निवास करती हैं, वहीं हिमालयन ग्रिफन और यूरेशियन ग्रिफन जैसे प्रवासी पक्षी सर्दियों के मौसम में लंबी दूरी तय कर यहां पहुंचते हैं। इन विभिन्न प्रजातियों की मौजूदगी जंगल के प्राकृतिक खाद्य चक्र और संतुलन को सुचारू रूप से बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चट्टानें और घाटियां बनीं आदर्श आश्रय स्थल

विंध्य पर्वतमाला की गगनचुंबी चट्टानें, गहरी घाटियां और घना जंगल इन पक्षियों के लिए एक आदर्श प्राकृतिक आवास का निर्माण करते हैं। ऊंची और दुर्गम चट्टानें गिद्धों को मानव बस्तियों की पहुंच से दूर सुरक्षित घोंसले बनाने और अंडे देने के लिए बेहतरीन स्थान उपलब्ध कराती हैं। इसके अतिरिक्त, घाटियों से उठने वाले गर्म हवा के प्राकृतिक झोंके इन विशालकाय पक्षियों को बिना अधिक ऊर्जा खर्च किए आसमान में लंबी उड़ान भरने में सहायता प्रदान करते हैं। इसके साथ ही जंगल में उपलब्ध मृत वन्यजीवों के अवशेष इन्हें पर्याप्त और प्राकृतिक आहार सुलभ कराते हैं।

प्रभावी वन प्रबंधन और संरक्षण के प्रयास

गिद्धों की तादाद में हुई इस उल्लेखनीय वृद्धि के पीछे बेहतर वन प्रबंधन और सुरक्षित भोजन की उपलब्धता की अहम भूमिका रही है। पशुओं के चिकित्सीय उपचार में उपयोग की जाने वाली प्रतिबंधित डाइक्लोफेनाक जैसी हानिकारक दवाओं के इस्तेमाल पर सख्ती से रोक लगाने के कारण इन पक्षियों को जहरीले आहार से मिलने वाले खतरे से बड़ी राहत मिली है। इसके अलावा वन विभाग द्वारा जंगलों को आग से बचाने के उपाय, मानवीय हस्तक्षेप पर कड़ा नियंत्रण और वनकर्मियों की सतत निगरानी ने इनके संरक्षण को और अधिक मजबूत किया है। पर्यावरण में प्रकृति के सफाईकर्मी के रूप में पहचाने जाने वाले गिद्ध मृत जीवों को साफ कर बीमारियों के प्रसार को रोकने में भी अहम योगदान दे रहे हैं। पार्क प्रबंधन का मानना है कि समन्वित प्रयासों का ही यह परिणाम है कि आज बांधवगढ़ बाघों के साथ-साथ गिद्धों के एक सुरक्षित और समृद्ध गढ़ के रूप में अपनी नई पहचान स्थापित कर चुका है।

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