शबरी ने भगवान राम को क्यों खिलाए थे जूठे बेर? चित्रकूट के आश्रम की जानें कहानी

चित्रकूट को भगवान श्रीराम की तपोस्थली माना जाता है. यहां कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनका संबंध रामायण की कथाओं से बताया जाता है. इन्हीं में से एक मानिकपुर का शबरी आश्रम है. माता शबरी और भगवान श्रीराम के प्रेम और भक्ति की कथा के कारण इस आश्रम में आदिवासी समाज सहित कई श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है.

चित्रकूट के पाठा क्षेत्र के मानिकपुर में शबरी आश्रम स्थित है. इस स्थान को माता शबरी और भगवान श्रीराम से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के कारण जाना जाता है. आश्रम में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता शबरी की प्रतिमाएं मौजूद हैं.

मान्यता के अनुसार माता शबरी भगवान श्रीराम की परम भक्त थीं. वह लंबे समय से उनके आने की प्रतीक्षा कर रही थीं. जब भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ उनके आश्रम पहुंचे, तो शबरी बेहद प्रसन्न हुईं. उनके पास प्रभु को खिलाने के लिए कुछ खास नहीं था, इसलिए उन्होंने बेर खिलाए.

धार्मिक कथा के अनुसार माता शबरी हर बेर को पहले चखकर देखती थीं कि वह मीठा है या नहीं. इसके बाद मीठा बेर भगवान श्रीराम को देती थीं. इसे शबरी के जूठे बेर की कथा के रूप में जाना जाता है. मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने उनके प्रेम और भक्ति को देखकर बेर स्वीकार किए थे.

आदिवासी समाज से आने वाले राजन कोल के मुताबिक, माता शबरी की कथा और आश्रम से आदिवासी समाज की विशेष आस्था जुड़ी हुई है. उन्होंने बताया कि पाठा क्षेत्र में बने इस आश्रम में लोग माता शबरी की पूजा-अर्चना करते हैं. आज भी समाज के लोगों में माता शबरी और भगवान श्रीराम के प्रति गहरा प्रेम है.

आश्रम के पुजारी अच्छे लाल के मुताबिक, माता शबरी मतंग ऋषि की शिष्या थीं. मान्यता है कि मतंग ऋषि ने उन्हें भगवान श्रीराम का जाप करते रहने और उनके दर्शन होने की बात कही थी. इसी विश्वास के साथ माता शबरी प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा करती रहीं.

पुजारी अच्छे लाल के अनुसार, शबरी आश्रम में आज भी आदिवासी समाज के साथ दूसरे समुदायों के श्रद्धालु भी दर्शन-पूजन के लिए आते हैं. आश्रम में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता शबरी की प्रतिमाएं स्थापित हैं. यह स्थान लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है.

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