पानी नहीं, 40 हजार किलो देसी घी से बना है राजस्थान का ये मंदिर! बनने में लग गए 86 साल, अंदर से ऐसा है नजारा

क्या आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जिसके निर्माण में पानी की जगह घी का इस्तेमाल किया गया हो? सुनने में यह बात भले ही हैरान करने वाली लगे, लेकिन राजस्थान में मौजूद एक प्राचीन मंदिर से जुड़ी यह कहानी काफी मशहूर है…
राजस्थान के रेगिस्तानी शहर बीकानेर में स्थित करीब 550 साल पुराना भांडासर जैन मंदिर अपनी अनोखी निर्माण कला के लिए जाना जाता है. कहा जाता है कि इस 15वीं सदी के मंदिर को बनाने में पानी की जगह घी का इस्तेमाल किया गया था. . इसकी वजह यह थी कि बीकानेर में उस समय पानी की काफी कमी रहती थी. इसी वजह से इस मंदिर को भारत की अनोखी ऐतिहासिक इमारतों में गिना जाता है
भांडासर जैन मंदिर के निर्माण में करीब 40,000 किलोग्राम शुद्ध घी इस्तेमाल किए जाने की मान्यता है. कहा जाता है कि मंदिर की दीवारों को जोड़ने के लिए तैयार किए गए चूने के मसाले में पानी की जगह घी मिलाया गया था. इस मंदिर से जुड़ी एक और दिलचस्प मान्यता है. स्थानीय लोगों का मानना है कि गर्मियों के सबसे गर्म दिनों में मंदिर के फर्श के कुछ हिस्सों से आज भी घी जैसे चिकने पदार्थ के निशान दिखाई देते हैं.
यह मंदिर जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ को समर्पित है. ऐतिहासिक जानकारियों और जैन परंपराओं के मुताबिक, मंदिर का निर्माण साल 1468 में शुरू हुआ था. इसे बीकानेर के एक धनी जैन व्यापारी भांडासा ओसवाल ने बनवाना शुरू करवाया था.
उस दौर में राजस्थान के इस इलाके में सूखे और पानी की भारी किल्लत की समस्या थी. स्थानीय लोककथा के अनुसार, एक बार भांडासा ओसवाल ने घी की गिरी हुई एक बूंद को भी बहुत सावधानी से संभालकर रखा था.
इस बात पर कुछ लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और उन्हें कंजूस समझा. इसके बाद भांडासा ने अपनी बात साबित करने के लिए एक अनोखी घोषणा की. उन्होंने कहा कि वह मंदिर के निर्माण में पानी की जगह घी का इस्तेमाल करेंगे और इसी से मसाला तैयार करवाएंगे.
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर के निर्माण में करीब 40,000 किलोग्राम शुद्ध घी चूने के मसाले में मिलाया गया था. हालांकि, इतिहासकार इस कहानी को पूरी तरह प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपरा मानते हैं. भांडासा ओसवाल का निधन साल 1514 में हो गया था, लेकिन उनके बाद भी मंदिर का निर्माण जारी रहा. आखिरकार करीब 1554 में इसका काम पूरा हुआ. यानी मंदिर को बनने में लगभग 86 साल लगे.
इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता काफी दिलचस्प है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जब गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचता है, तो मंदिर के पुराने पत्थर के फर्श के कुछ हिस्सों पर तेल जैसे छोटे निशान दिखाई देने लगते हैं. कई श्रद्धालु इन्हें पुराने समय में इस्तेमाल किए गए घी के अवशेष मानते हैं. हालांकि, इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं है.
तीन मंजिला यह मंदिर जैन वास्तुकला और राजस्थानी कारीगरी का शानदार उदाहरण है. इसकी दीवारों और छतों पर बेहद खूबसूरत भित्ति चित्र बनाए गए हैं. यहां की छतों पर सोने की परत से की गई पेंटिंग और बारीक शीशे का काम भी देखने लायक है. मंदिर में जैन धर्म के सभी 24 तीर्थंकरों को दर्शाती नक्काशी भी की गई है. फिलहाल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इस मंदिर को एक विरासत स्मारक के रूप में संरक्षित करता है

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