श्राध्द के दौरान कई बार कौवों को भोजन कराना बेहद कठिन हो जाता है। एक तो वो मिलते नहीं है और मिलते हैं तो कई बार खाते नहीं है। ऐसे में साधकों के सामने बड़ी चुनौती होती है कि आखिर भोजन कैसे कराया जाए। शास्त्रों और पुरोहितों के अनुसारकौवा न मिलने पर दूसरे पशु पक्षीओं को खिलाने का भी प्रावधान है।
गाय: गाय को रोटी या चारा खिलाएं। गाय में सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है।
कुत्ता: कुत्ते को भोजन कराएं। कुत्ते को यम का दूत और पितरों का मार्गदर्शक माना जाता है।
चींटियां: चींटियों के लिए आटा या शक्कर मिला दाना डालें। चींटियां असंख्य जीवों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
अन्य पक्षी: आसपास रहने वाले अन्य पक्षियों के लिए बाजरा, ज्वार या अनाज के दाने छत पर या खुले मैदान में रखें।
जानकारों का कहना है कि इन जीवों को भोजन कराने का उद्देश्य सिर्फ धार्मिक कर्मकांड पूरा करना नहीं है, बल्कि इसके पीछे का मुख्य भाव जीवों के प्रति दया, सेवा और परोपकार को बढ़ावा देना है। सनातन धर्म में प्रकृति और जीवों की सेवा को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जब हम किसी बेजुबान जानवर या पक्षी की भूख मिटाते हैं, तो इससे मिलने वाला पुण्य सीधे हमारे पितरों को प्राप्त होता है और उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यह वह रहस्य है जो कई बार कर्मकांडों की भीड़ में छिप जाता है।
जीवों को भोजन कराते समय साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। भोजन शुद्ध और सात्विक होना चाहिए, जो उनके स्वास्थ्य को नुकसान न पहुंचाए। जानकारों के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध से जुड़ी परंपराओं में थोड़ा बदलाव हो सकता है, लेकिन पूरे श्रद्धा भाव से किया गया अन्न दान और जीवों की निस्वार्थ सेवा पितरों के प्रति सच्चा सम्मान प्रकट करने का सबसे अच्छा और रहस्यमयी माध्यम है। यही वह सच्चा मार्ग है जिससे पितर तृप्त होते हैं और समाज में परोपकार की भावना भी मजबूत होती है।

