Supreme Court on UP Police नई दिल्ली : उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर योगी सरकार के सामने एक बार फिर जवाबदेही का गंभीर सवाल खड़ा हो गया है. बुलंदशहर के खुर्जा नगर थाने में दर्ज 2021 के एक आपराधिक मामले की जांच पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस के रवैये पर बेहद सख्त टिप्पणी की। अदालत ने यहां तक कहा कि अगर पुलिस इसी तरह काम करेगी तो उसकी जांच सीबीआई को सौंप देना और पुलिस को भंग कर देना ही बेहतर होगा.
Supreme Court on UP Police : सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
“हर चीज़ में आपका कोई न कोई एजेंडा होता है; अगर आप मामलों को इस तरह से संभालेंगे तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे? बेहतर होगा कि हम UP पुलिस की सभी जांचों में CBI को शामिल करने के लिए कहें। इससे तो अच्छा है कि हम UP पुलिस को ही खत्म कर दें। यह बकवास किसी न किसी मोड़ पर तो रुकनी ही चाहिए: सुप्रीम कोर्ट”
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने सबसे बुनियादी सवाल उठाया—जब कथित आरोपी को घटनास्थल पर ही पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया था, तो एफआईआर में उसे अज्ञात क्यों बताया गया? अदालत की नाराजगी केवल एक नाम दर्ज न करने तक सीमित नहीं थी. सवाल यह था कि आखिर जांच में ऐसी विसंगतियां क्यों सामने आईं और पुलिस की जवाबदेही कौन तय करेगा?
मौके पर पकड़ा गया व्यक्ति, फिर FIR में ‘अज्ञात’ क्यों?
मामला वर्ष 2021 में बुलंदशहर के खुर्जा नगर थाने में दर्ज एक आपराधिक केस से जुड़ा है. याचिकाकर्ता वीणा सलूजा के मुताबिक, छेड़छाड़ के कथित आरोपी मोटरसाइकिल सवार को घटना के समय ही पकड़कर पुलिस को सौंप दिया गया था. इसके बावजूद एफआईआर में उसका नाम दर्ज नहीं किया गया और आरोपी को अज्ञात बताया गया.
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उन्होंने इस विसंगति के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हाईकोर्ट की ओर से स्टेटस रिपोर्ट मांगे जाने के बाद आरोपी का नाम चार्जशीट में शामिल किया गया, लेकिन बाद में उसे क्लीन चिट दे दी गई.
मामले में जब्त मोटरसाइकिल को लेकर भी सवाल उठाए गए. याचिकाकर्ता के अनुसार, जब पुलिस ने बाइक जब्त की थी, तब उस पर नंबर प्लेट नहीं थी. बाद की जांच में उसका रजिस्ट्रेशन नंबर दर्ज किया गया.
इन तथ्यों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि जब व्यक्ति मौके पर पकड़ा गया था, तो एफआईआर में उसका नाम क्यों नहीं लिखा गया. अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से पुलिस पर लोगों का भरोसा कैसे कायम रहेगा?
‘हर जांच में कोई न कोई एजेंडा होता है’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यशैली पर तीखी नाराजगी जाहिर की. पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि पुलिस की लगभग हर जांच में कोई न कोई एजेंडा होता है. अदालत ने सवाल किया कि यदि मौके पर पकड़े गए व्यक्ति को ही एफआईआर में अज्ञात बताया जाएगा, तो आम नागरिक पुलिस पर विश्वास कैसे करेगा?
पीठ ने यह भी कहा कि पुलिस का काम अपराध को उजागर करना है, न कि तथ्यों को छिपाने या किसी को बचाने की कोशिश करना. अदालत की टिप्पणियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता केवल औपचारिकताएं नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की बुनियादी जरूरत हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के जवाबी हलफनामे को भी निराशाजनक बताया. पीठ ने मामले को ढकने की कोशिश किए जाने की आशंका जताते हुए कहा कि किसी के इशारे पर चलना और जरूरत से ज्यादा झुक जाना दो अलग बातें हैं.
योगी सरकार के लिए सबक: जवाबदेही सिर्फ दावों से नहीं आती
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी की तरह है. कानून-व्यवस्था पर सख्ती के दावे तभी भरोसेमंद बनते हैं, जब पुलिस की जांच भी निष्पक्ष, पारदर्शी और सवालों से परे हो.
अगर किसी मामले में शिकायतकर्ता का आरोप है कि आरोपी को मौके पर पकड़ने के बावजूद उसका नाम एफआईआर में दर्ज नहीं किया गया और बाद की जांच में भी गंभीर विसंगतियां सामने आती हैं, तो यह केवल एक केस की तकनीकी खामी नहीं रह जाती. इससे पुलिस की जवाबदेही, जांच की विश्वसनीयता और पीड़ित को न्याय मिलने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं.
सरकार के सामने चुनौती केवल अपराधियों पर कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि पुलिस किसी प्रभाव, दबाव या पक्षपात के बिना कानून के मुताबिक काम करे. पुलिस की किसी भी कथित चूक पर समयबद्ध और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि गलत काम करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सके.
जांच अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट में पेश होने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के जांच अधिकारी को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है. पुलिस को नया हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करना होगा कि मौके पर पकड़े गए व्यक्ति का नाम एफआईआर में दर्ज क्यों नहीं किया गया और बाद में उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई ?
अदालत ने पुलिस से इस पूरे घटनाक्रम पर स्पष्ट जवाब मांगा है. अब संबंधित अधिकारी को यह बताना होगा कि शुरुआती एफआईआर में आरोपी की पहचान क्यों नहीं दर्ज हुई और जांच के दौरान सामने आए बदलावों का आधार क्या था ?
‘पुलिस को भंग कर दें’—अदालत की टिप्पणी का मतलब
सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि यदि यूपी पुलिस इसी तरह जांच करती है, तो उसकी सभी जांच सीबीआई को सौंपने और पुलिस को भंग कर देने पर विचार करना पड़ सकता है. एक राज्य की सरकार से सुप्रीम कोर्ट का या सवाल उस संस्थागत भरोसे पर सवाल है, जिसके आधार पर नागरिक पुलिस से सुरक्षा और न्याय की उम्मीद करते हैं.
इस मामले में असली कसौटी अब जवाबदेही की है. यूपी पुलिस को अदालत के सवालों का स्पष्ट जवाब देना होगा. वहीं, राज्य सरकार के लिए भी यह जरूरी है कि वह सुनिश्चित करे कि जांच में लापरवाही, पक्षपात या कथित लीपापोती के आरोपों को गंभीरता से लिया जाए. कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब पुलिस खुद भी कानून और जवाबदेही के दायरे में पूरी तरह बंधी रहे.

