‘Holi of Milk’ at Har Ki Pauri हरिद्वार: धर्मनगरी हरिद्वार में रविवार, 23 अगस्त को हर की पौड़ी पर एक अनोखा और भावुक दृश्य देखने को मिला. यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे मुल्तानी समाज के लोगों ने मां गंगा के साथ ‘दूध की होली’ खेली. हाथों में रंग और गुलाल के बजाय दूध की बाल्टियां और पिचकारियां थीं. लोगों ने गंगा में दूध अर्पित किया, एक-दूसरे को गुलाल लगाया और मां गंगा के जयकारों के बीच देश-दुनिया में सुख-शांति की कामना की.
यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि करीब 116 साल पुरानी आस्था और इतिहास से जुड़ा हुआ है. इसकी शुरुआत 1911 में मुल्तान के व्यापारी लाला रूपचंद से जुड़ी बताई जाती है.
‘Holi of Milk’ at Har Ki Pauri: हर की पौड़ी पर दूध की होली का अनोखा नजारा
हर की पौड़ी पर आमतौर पर श्रद्धालु गंगा स्नान, पूजा-अर्चना और गंगा आरती करते नजर आते हैं, लेकिन 23 अगस्त को यहां का नजारा कुछ अलग था. गंगा घाट पर पहुंचे मुल्तानी समाज के लोगों के हाथों में दूध से भरी बाल्टियां और पिचकारियां थीं.
आयोजन शुरू होते ही मां गंगा के जयकारे गूंजने लगे. लोगों ने गंगा में दूध अर्पित किया और फिर एक-दूसरे के साथ दूध की होली खेली. गुलाल से एक-दूसरे को रंगने के साथ श्रद्धालुओं ने मां गंगा से देश की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना की.
इस अनोखे आयोजन को देखने के लिए घाट पर मौजूद अन्य श्रद्धालुओं की भी नजरें टिक गईं.
1911 में शुरू हुई थी इस परंपरा की कहानी
मुल्तानी समाज की इस परंपरा की शुरुआत करीब 116 साल पहले 1911 में मुल्तान से हुई बताई जाती है. उस समय वहां लाला रूपचंद नाम के एक व्यापारी रहते थे.
बताया जाता है कि लाला रूपचंद की दस संतानें थीं, लेकिन दुर्भाग्य से उनकी कोई संतान जीवित नहीं बची थी. इसी दौरान उनकी एक बेटी गंभीर रूप से घायल हो गई. बेटी की हालत देखकर लाला रूपचंद काफी चिंतित हो गए और उन्हें डर सताने लगा कि कहीं वह भी उन्हें छोड़कर न चली जाए.
इसी दौरान उन्हें सलाह दी गई कि यदि वह मुल्तान से पैदल हरिद्वार जाएं और मां गंगा में ज्योत प्रवाहित करें, तो उनकी मनोकामना पूरी हो सकती है.
मुल्तान से पैदल हरिद्वार पहुंचे थे लाला रूपचंद
लाला रूपचंद ने इस सलाह को आस्था के साथ स्वीकार किया और मुल्तान से पैदल हरिद्वार के लिए निकल पड़े. लंबी यात्रा के बाद वह हरिद्वार पहुंचे और मां गंगा में ज्योत प्रवाहित की.
मुल्तानी समाज की मान्यता के अनुसार उनकी मनोकामना पूरी हुई. इसके बाद लाला रूपचंद से जुड़ी यह यात्रा धीरे-धीरे एक सामुदायिक परंपरा में बदल गई.
पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा आगे बढ़ती रही और मुल्तानी समाज हरिद्वार पहुंचकर मां गंगा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने लगा.
116वें मुल्तान जोत महोत्सव में दिखी आस्था
इसी ऐतिहासिक परंपरा को आज मुल्तान जोत महोत्सव के रूप में मनाया जाता है. इस वर्ष इसका 116वां आयोजन हुआ.
23 अगस्त को देश के विभिन्न हिस्सों से मुल्तानी समाज के लोग हर की पौड़ी पहुंचे. यहां ज्योत प्रवाहित करने के साथ दूध अर्पित किया गया और दूध की पिचकारियों से होली खेली गई.
गंगा घाट पर हर-हर गंगे के जयकारों के बीच पूरा माहौल उत्सवमय नजर आया. इस दौरान लोगों ने एक-दूसरे को गुलाल भी लगाया.
दूध की होली में आस्था के साथ दिया गया गंगा स्वच्छता का संदेश
इस आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक संदेश भी देखने को मिला। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने मां गंगा से देश और समाज की खुशहाली की प्रार्थना की।
लोगों ने देश में सुख-शांति, आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द की कामना की। साथ ही गंगा को स्वच्छ और निर्मल रखने का संदेश भी दिया गया.
आयोजन में शामिल लोगों का कहना था कि मां गंगा के प्रति श्रद्धा तभी सार्थक है, जब गंगा की स्वच्छता और संरक्षण के लिए भी समाज अपनी जिम्मेदारी समझे.
हर की पौड़ी पर आकर्षण का केंद्र बना आयोजन?
हरिद्वार की हर की पौड़ी पर रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं,लेकिन दूध की बाल्टियां और पिचकारियां लेकर पहुंचे मुल्तानी समाज के लोगों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया.
घाट पर मौजूद श्रद्धालु इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए रुकते रहे. दूध की होली के दृश्य कैमरों में भी कैद किए गए. गंगा किनारे हर-हर गंगे के जयकारों के बीच आयोजित इस कार्यक्रम ने लोगों को 116 साल पुरानी परंपरा से रूबरू कराया.
एक व्यापारी की आस्था से बनी पीढ़ियों की परंपरा
1911 में लाला रूपचंद की आस्था से शुरू हुई यह कहानी आज एक बड़े आयोजन का रूप ले चुकी है. एक सदी से ज्यादा समय गुजरने के बावजूद मुल्तानी समाज इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ा रहा है.
आज भी समाज के लोग हरिद्वार पहुंचते हैं, मां गंगा के सामने ज्योत जलाते हैं, दूध अर्पित करते हैं और अपनी आस्था प्रकट करते हैं. इस तरह मुल्तान जोत महोत्सव सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, परंपरा और सामुदायिक जुड़ाव का प्रतीक बन गया है.

