हरिद्वार में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर संत सम्मेलन, CM धामी-शिवराज-रामदेव समेत जुटे दिग्गज

One Nation One Election Summit : हरिद्वार में आज ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के मुद्दे पर संत समाज का बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. ज्वालापुर मार्ग स्थित श्रीजी वाटिका में हो रहे इस कार्यक्रम में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, योग गुरु स्वामी रामदेव और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी समेत संत समाज और कई गणमान्य लोग मौजूद हैं. सम्मेलन में देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव पर मंथन किया जा रहा है.

One Nation One Election Summit : हरिद्वार में एक राष्ट्र, एक चुनाव पर संतों का मंथन

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को लेकर आयोजित यह सम्मेलन हरिद्वार में श्रीजी वाटिका में हो रहा है.कार्यक्रम में अलग-अलग अखाड़ों, मठों और धार्मिक परंपराओं से जुड़े संतों को आमंत्रित किया गया है.

जानकारी के मुताबिक सम्मेलन में 100 से अधिक संत-महात्माओं के शामिल होने की बात कही गई है.आयोजन में 13 अखाड़ों समेत विभिन्न धार्मिक संस्थाओं और संत समाज के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है.

सम्मेलन का उद्देश्य ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को लेकर संत समाज के विचार और सुझाव सामने लाना तथा इस विषय पर समाज के बीच चर्चा को आगे बढ़ाना बताया गया है.

CM धामी, शिवराज सिंह चौहान और रामदेव पहुंचे

हरिद्वार के इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी शामिल हुए हैं. उनके साथ केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान, योग गुरु स्वामी रामदेव और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी समेत कई प्रमुख संत और गणमान्य व्यक्ति मौजूद हैं.

कार्यक्रम को लेकर हरिद्वार में सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ाई गई है. आयोजन स्थल पर पुलिस बल की तैनाती के साथ ही यातायात व्यवस्था पर विशेष निगरानी रखी जा रही है.

क्या है ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’?

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का अर्थ लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवस्था से है. केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य बार-बार होने वाले चुनावों से जुड़ी प्रशासनिक चुनौतियों, खर्च और चुनावी गतिविधियों के कारण शासन में आने वाले व्यवधान को कम करना है.

भारत में यह व्यवस्था पहले भी लागू रही है. केंद्र सरकार के अनुसार 1951-52 से 1967 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते रहे थे. 1957, 1962 और 1967 के चुनाव भी इसी व्यवस्था के तहत हुए थे. बाद में कुछ विधानसभाओं और लोकसभा के समय से पहले भंग होने के कारण चुनाव चक्र अलग-अलग हो गया.

एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में क्या तर्क दिए जाते हैं?

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के समर्थकों का तर्क है कि देश में लगातार होने वाले चुनावों के कारण प्रशासनिक मशीनरी बार-बार चुनावी ड्यूटी में लगती है. इसके अलावा सुरक्षा बलों की तैनाती, चुनावी खर्च और आचार संहिता के कारण सरकारी कामकाज पर भी असर पड़ सकता है.

एक साथ चुनाव होने की स्थिति में चुनावी प्रक्रिया को एक निर्धारित चक्र में आयोजित करने और संसाधनों के अधिक प्रभावी इस्तेमाल की संभावना जताई जाती है.

केंद्र सरकार के आधिकारिक विवरण के मुताबिक प्रस्ताव के समर्थक इसे प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने, चुनावी खर्च कम करने और नीतिगत निरंतरता को बढ़ावा देने वाला सुधार मानते हैं.

संत सम्मेलन क्यों माना जा रहा है महत्वपूर्ण?

हरिद्वार देश के प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्रों में शामिल है. ऐसे में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक और चुनावी सुधार के मुद्दे पर संत समाज का सम्मेलन अपने आप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

आयोजकों के मुताबिक सम्मेलन में इस बात पर चर्चा हो रही है कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था का लोकतांत्रिक व्यवस्था, सुशासन और जनहित पर क्या प्रभाव पड़ सकता है. संत समाज की ओर से इस मुद्दे पर विचार और सुझाव भी सामने रखे जाने की बात कही गई है.

कार्यक्रम स्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और बड़ी संख्या में संतों के कार्यक्रम में पहुंचने के कारण प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष इंतजाम किए हैं. आयोजन स्थल पर पुलिस बल की तैनाती की गई है और यातायात व्यवस्था पर भी नजर रखी जा रही है.

हरिद्वार में होने वाले इस सम्मेलन पर राजनीतिक और धार्मिक दोनों नजरिए से लोगों की निगाहें टिकी हैं. कार्यक्रम में संत समाज की ओर से ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को लेकर सामने आने वाले विचार और सुझाव आगे की चर्चा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर आगे क्या?

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर बहस केवल चुनाव की तारीखों को एक करने तक सीमित नहीं है. इसमें संविधान और चुनावी व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू भी शामिल हैं. केंद्र सरकार की ओर से गठित उच्चस्तरीय समिति ने 2024 में अपनी रिपोर्ट दी थी और केंद्र सरकार ने 18 सितंबर 2024 को समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया था.

ऐसे में हरिद्वार का यह संत सम्मेलन इस विषय को धार्मिक-सामाजिक विमर्श के स्तर पर आगे बढ़ाने की एक महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा रहा है.

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