11 हजार फीट की ऊंचाई पर दूध-दही और मक्खन की होली, दयारा बुग्याल में सजा अनोखा बटर फेस्टिवल

Dayara Bugyal Butter Festival उत्तरकाशी: उत्तराखंड के उत्तरकाशी स्थित दयारा बुग्याल में सोमवार को प्रकृति, आस्था और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला. समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर आयोजित पारंपरिक अंढूड़ी उत्सव यानी बटर फेस्टिवल में ग्रामीणों ने रंग और गुलाल की जगह दूध, दही, मट्ठे और मक्खन से होली खेली. हिमालय की ऊंची पहाड़ियों और हरे-भरे बुग्याल के बीच मनाया गया यह अनोखा पर्व लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा. उत्तराखंड पर्यटन विभाग भी अंढूड़ी उत्सव को दयारा बुग्याल की विशिष्ट लोक परंपरा के रूप में दर्ज करता है.

Dayara Bugyal Butter Festival:देवडोली के साथ दयारा बुग्याल पहुंचे ग्रामीण

दयारा पर्यटन विकास समिति की ओर से आयोजित इस पर्व में पंचगाई पट्टी के रैथल, नटीण, बंद्राणी, क्यार्क और भटवाड़ी गांवों के ग्रामीण अपने आराध्य समेश्वर देवता की देवडोली के साथ दयारा बुग्याल पहुंचे. उत्तरकाशी जिले के दूसरे इलाकों से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु इस पारंपरिक उत्सव में शामिल हुए.

पर्व की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुई. पांच पांडवों के पश्वाओं के अवतरित होने के बाद समेश्वर देवता की देवडोली के साथ उनके पश्वा भी अवतरित हुए. लोक मान्यता के अनुसार समेश्वर देवता ने कफुवा पर डांगरियों के बीच चलकर मेलार्थियों को आशीर्वाद दिया.

इसके बाद बुग्याल में बनी छानियों में एकत्र किए गए दूध, दही और मक्खन को वन देवताओं और स्थानीय देवी-देवताओं को भोग लगाया गया.

राधा-कृष्ण ने फोड़ी मक्खन से भरी हांडी

धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद राधा-कृष्ण की जोड़ी ने मक्खन से भरी हांडी फोड़ी. हांडी टूटते ही पूरा बुग्याल उत्सव के रंग में रंग गया. ग्रामीणों ने एक-दूसरे के चेहरे पर मक्खन और दूध-दही लगाया और पारंपरिक अंदाज में होली खेली.

अंढूड़ी उत्सव की खासियत ही यही है कि यहां सामान्य होली की तरह गुलाल या रंगों का इस्तेमाल नहीं होता. दूध, मक्खन और मट्ठे से खेली जाने वाली यह होली दयारा बुग्याल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है.

ढोल-दमाऊं की थाप पर जमकर हुआ रासौ-तांदी नृत्य

उत्सव के दौरान महिलाओं ने पारंपरिक लोकवेशभूषा में राधा-कृष्ण की जोड़ी के साथ रासौ-तांदी नृत्य प्रस्तुत किया. पुरुषों ने भी नृत्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. ढोल-दमाऊं की गूंज और पहाड़ी लोकगीतों ने पूरे दयारा बुग्याल को देर तक गुंजायमान रखा.

श्रद्धालुओं और पर्यटकों ने भी ग्रामीणों के साथ इस अनोखी परंपरा का आनंद लिया. अंढूड़ी उत्सव में धार्मिक आस्था के साथ उत्तराखंड की समृद्ध गढ़वाली लोक संस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा, संगीत और नृत्य का जीवंत प्रदर्शन देखने को मिला.

सदियों पुरानी परंपरा है अंढूड़ी उत्सव

दयारा पर्यटन विकास समिति के अध्यक्ष मनोज राणा के अनुसार अंढूड़ी पर्व सदियों पुरानी लोक परंपरा से जुड़ा है. गर्मियों में ग्रामीण अपने मवेशियों को बुग्यालों में चराने के लिए ले जाते हैं. जब मौसम बदलने पर मवेशियों को वापस गांव लाने का समय आता है, तब यह पर्व मनाया जाता है.

इस दौरान ग्रामीण प्रकृति, वन देवताओं और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आभार जताते हैं तथा सुख-समृद्धि और पशुधन की कुशलता की कामना करते हैं. उत्तराखंड पर्यटन के अनुसार भी अंढूड़ी उत्सव प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता से जुड़ा पर्व है.

ग्रामीणों का कहना है कि पीढ़ियों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा को जीवंत रखना नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है. दयारा बुग्याल का यह उत्सव अब उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पर्यटन का भी महत्वपूर्ण आकर्षण बन चुका है.

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