नई दिल्ली| देश की सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक (पेपर लीक) और अन्य तमाम अनुचित साधनों पर सख्त लगाम लगाने के उद्देश्य से लाए गए 'पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026' को देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की औपचारिक मंजूरी मिल गई है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयक को संसद के दोनों सदनों से इसी सप्ताह भारी सहमति के साथ पारित किया गया था। शुक्रवार को केंद्रीय कानून मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक राजपत्र (गजट) अधिसूचना के माध्यम से राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने की यह जानकारी सार्वजनिक की गई।
पेपर लीक मामलों की जांच कितने समय में पूरी होगी?
इस नए और संशोधित कानून के प्रावधानों के तहत अब प्रश्नपत्र लीक या परीक्षा में गड़बड़ी से जुड़े प्रत्येक मामले की जांच मात्र दो महीने (60 दिन) के भीतर पूरी करना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। इस सख्त नियम का मुख्य उद्देश्य मामलों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित करना और दोषियों के खिलाफ समयबद्ध तरीके से कड़ी कार्रवाई करना है।
दोषियों को कितनी सजा और भारी जुर्माना भुगतना होगा?
नया संशोधित कानून बेहद कड़े प्रावधान लेकर आया है। इसके अनुसार, सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक कराने, करवाने या अन्य किसी भी अनुचित साधन का इस्तेमाल करने वाले दोषियों को कम से कम 5 साल और अधिकतम 10 साल तक की लंबी कैद की सजा भुगतनी पड़ सकती है। इसके साथ ही, अपराधियों पर 50 लाख रुपये तक का भारी आर्थिक जुर्माना भी लगाया जा सकेगा।
संगठित गिरोहों और सिंडिकेट के लिए क्या है नया प्रावधान?
यदि प्रश्नपत्र लीक करने या परीक्षा में किसी भी प्रकार की धांधली को अंजाम देने का कार्य किसी संगठित अपराध सिंडिकेट या गिरोह द्वारा किया जाता है, तो ऐसे गंभीर मामलों में दोषियों के लिए कम से कम 7 साल की कैद का कड़ा प्रावधान तय किया गया है। इसके अलावा, ऐसे मामलों में संलिप्त अपराधियों पर 10 करोड़ रुपये तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान है।
राज्यों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट क्यों और कैसे काम करेंगे?
इस संशोधित कानून के तहत देश के प्रत्येक राज्य में विशेष 'फास्ट-ट्रैक अदालतों' की स्थापना किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि प्रश्नपत्र लीक और सार्वजनिक परीक्षाओं की व्यवस्था में सेंध लगाने वाली अनियमितताओं से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई तेज गति से हो सके, ताकि अदालतें कम समय में फैसला सुनाकर दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिला सकें।

