सावन शिवरात्रि का पर्व आते ही देशभर के शिव मंदिरों में “हर-हर महादेव” के जयकारे गूंजने लगते हैं. इस दिन लाखों श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य व मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं, अगर आपने कभी सावन शिवरात्रि पर किसी शिव मंदिर में दर्शन किए हों, तो एक बात जरूर नोटिस की होगी कि कई भक्त सिर्फ एक बार जल चढ़ाकर नहीं लौटते, बल्कि दो, तीन या कई बार जलाभिषेक करते हैं.
ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या ऐसा करना किसी धार्मिक नियम का हिस्सा है या फिर यह केवल श्रद्धा का प्रतीक है? दरअसल, इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ व्यक्तिगत आस्था भी जुड़ी हुई है. आइए जानते हैं कि सावन शिवरात्रि पर कई बार जलाभिषेक करने की परंपरा क्यों प्रचलित है और इसका आध्यात्मिक महत्व क्या माना जाता है.
सावन शिवरात्रि पर जलाभिषेक का विशेष महत्व
सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस पूरे महीने शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं. खासकर सावन शिवरात्रि के दिन किया गया जलाभिषेक अत्यंत शुभ माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा जीवन की कई परेशानियों को दूर करने में सहायक मानी जाती है. इसलिए श्रद्धालु पूरे विधि-विधान के साथ भगवान शिव का अभिषेक करते हैं.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की पूजा में संख्या से ज्यादा भाव का महत्व होता है. कई श्रद्धालु अपनी अलग-अलग मनोकामनाओं के लिए एक से अधिक बार जलाभिषेक करते हैं. कोई परिवार की सुख-शांति के लिए जल चढ़ाता है, फिर करियर, स्वास्थ्य या संतान की कामना के लिए दोबारा अभिषेक करता है. कुछ भक्त मंदिर की परिक्रमा करने के बाद हर चक्कर में शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं. यही वजह है कि वे एक ही दिन में कई बार जलाभिषेक करते दिखाई देते हैं.
क्या शास्त्रों में कई बार जल चढ़ाने का नियम है?
धार्मिक ग्रंथों में ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं मिलता कि शिवरात्रि पर निश्चित संख्या में जलाभिषेक करना ही चाहिए. शास्त्रों में मुख्य रूप से श्रद्धा, भक्ति और शुद्ध मन से पूजा करने पर जोर दिया गया है. यही कारण है कि कुछ लोग एक बार जल चढ़ाते हैं, जबकि कुछ अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार कई बार अभिषेक करते हैं. दोनों ही तरीके धार्मिक दृष्टि से स्वीकार्य माने जाते हैं.
कांवड़ यात्रा से भी जुड़ी है यह परंपरा
सावन में कांवड़ लेकर आने वाले श्रद्धालु लंबी यात्रा पूरी करने के बाद भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं. कई कांवड़िए समूह में आते हैं और हर सदस्य अलग-अलग जल अर्पित करता है. कई बार श्रद्धालु अलग-अलग समय पर दोबारा मंदिर पहुंचकर भी जलाभिषेक करते हैं. इससे मंदिरों में लगातार अभिषेक का क्रम चलता रहता है.
भक्ति में दोहराव नहीं, समर्पण का भाव होता है
धार्मिक जानकारों का कहना है कि भगवान शिव की पूजा में बार-बार जल चढ़ाने का उद्देश्य किसी नियम का पालन करना नहीं, बल्कि अपनी आस्था को व्यक्त करना होता है. जिस तरह कोई व्यक्ति बार-बार भगवान का नाम जपता है, उसी तरह कई श्रद्धालु बार-बार जलाभिषेक कर अपनी भक्ति व्यक्त करते हैं. उदाहरण के लिए, कई परिवारों में माता-पिता, बच्चे और अन्य सदस्य अलग-अलग समय पर शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं. देखने में यह कई राउंड जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा से पूजा करता है.
क्या एक बार जलाभिषेक करना पर्याप्त है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई भक्त पूरी श्रद्धा, विश्वास और विधि के साथ एक बार भी भगवान शिव का जलाभिषेक करता है, तो उसे भी उतना ही पुण्य प्राप्त माना जाता है. कई बार जल चढ़ाना अनिवार्य नहीं है. सबसे महत्वपूर्ण बात मन की सच्ची भक्ति और पूजा के समय सकारात्मक भाव रखना है. सावन शिवरात्रि पर कई बार जलाभिषेक करने की परंपरा किसी अनिवार्य धार्मिक नियम से नहीं, बल्कि श्रद्धा, संकल्प और व्यक्तिगत आस्था से जुड़ी हुई है. भगवान शिव भाव के भूखे माने जाते हैं, इसलिए चाहे एक बार जल चढ़ाएं या कई बार, यदि पूजा सच्चे मन से की जाए तो उसका आध्यात्मिक महत्व समान माना जाता है.

