वांगचुक इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और इनोवेटर के तौर पर समस्याओं का समाधान खोजते रहे

नई दिल्ली। सोनम वांगचुक एक बार फिर चर्चा में हैं। नीट परीक्षा में अनियमितताओं के विरोध में उनकी भूख हड़ताल के बीच तड़के पुलिस ने उन्हें जंतर-मंतर से जबरन उठाकर अस्पताल ले जाया गया। उनकी भूख हड़ताल 21वें दिन में पहुंच चुकी है। इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर वांगचुक को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कई यूजर्स उनकी सेहत को लेकर चिंतित हैं, जबकि जंतर-मंतर पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
यह पहली बार नहीं है जब सोनम वांगचुक किसी आंदोलन की वजह से सुर्खियों में आए हों। लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग से लेकर लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च जैसे मुद्दों को लेकर वह पहले भी चर्चा में रहे चुके हैं, लेकिन आंदोलनों से अलग सोनम वांगचुक की एक और पहचान है, जिसने उन्हें भारत ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों में पहचान दिलाई। वह इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और इनोवेटर के तौर पर लंबे समय से हिमालयी क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान खोजने में जुटे रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक लद्दाख में जन्मे सोनम वांगचुक ने साल 1988 में स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख की सह-स्थापना की थी। इसके पीछे सोच उन छात्रों को एक अलग तरह का शैक्षणिक माहौल देना था, जिन्हें पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। वे टिकाऊ इमारतों, रिन्यूएबल एनर्जी और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक तैयार किए गए समाधानों पर काम करते हैं। इस तरह कैंपस खुद एक प्रयोगशाला की तरह काम करता है, जहां पढ़ाई के साथ व्यावहारिक अनुभव पर जोर दिया जाता है।
सोनम वांगचुक के सबसे चर्चित इनोवेशन में आइस स्तूप का नाम सबसे पहले आता है। लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में खेती के समय पानी की कमी बड़ी समस्या रही है। लद्दाख में सर्दियों के दौरान तापमान काफी नीचे चला जाता है। ऐसे मौसम में घरों को गर्म रखना आसान नहीं होता और इसके लिए बड़ी मात्रा में ईंधन और ऊर्जा की जरूरत पड़ सकती है। वांगचुक और एसईसीएमओएल से जुड़े छात्रों ने इस समस्या पर भी काम किया। यहां छात्रों को कैंपस के संचालन और वास्तविक प्रोजेक्ट्स में भागीदारी का मौका मिलता है। वे सस्टेनेबल बिल्डिंग और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में काम करते हुए व्यावहारिक अनुभव हासिल करते हैं।
साल 2016 में शुरू हुआ हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख (एचआईएएल) भी सोनम वांगचुक की प्रमुख पहलों में शामिल है। इसके पीछे विचार ऐसी उच्च शिक्षा व्यवस्था तैयार करना था, जो हिमालयी और पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों से जुड़ी हो। यहां इंजीनियरिंग, पर्यावरण, टिकाऊ विकास और व्यावहारिक शिक्षा को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई। संस्थान का कैंपस ऊंचाई वाले इलाकों के अनुकूल क्लाइमेट-फ्रेंडली तकनीकों को आजमाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
सोनम वांगचुक का काम केवल तकनीकी आविष्कारों तक सीमित नहीं रहा। ऑपरेशन न्यू होप उनकी प्रमुख शिक्षा सुधार पहलों में से एक है। इसका उद्देश्य लद्दाख की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के साथ शिक्षकों के प्रशिक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक पढ़ाई को बढ़ावा देना था। इसका मकसद बच्चों के लिए पढ़ाई को उनकी जिंदगी और आसपास के माहौल से ज्यादा प्रासंगिक बनाना था। वांगचुक के काम में एक बात बार-बार दिखाई देती है-बड़ी समस्याओं के लिए स्थानीय संसाधनों से सरल और कम खर्च वाले समाधान तलाशना। चाहे पहाड़ों में पानी बचाने के लिए आइस स्तूप हो, ठंड से निपटने के लिए पैसिव सोलर इमारतें या फिर छात्रों को व्यावहारिक शिक्षा से जोड़ने का मॉडल, उनकी कोशिशें लद्दाख की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के इर्द-गिर्द विकसित हुई हैं। फिलहाल उनकी भूख हड़ताल और सेहत को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज है, लेकिन इन सुर्खियों के बीच उनके इनोवेशन और शिक्षा सुधार से जुड़े काम भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। आइस स्तूप से लेकर वैकल्पिक शिक्षा मॉडल तक, सोनम वांगचुक ने अपने प्रयोगों के जरिए यह दिखाने की कोशिश की है कि पहाड़ों की जटिल समस्याओं के समाधान स्थानीय जरूरतों को समझकर भी तलाशे जा सकते हैं।

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