जल जीवन मिशन की हकीकत आई सामने, CAG रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ की कमजोर रैंकिंग उजागर

रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा के पटल पर रखी गई भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट में राज्य के भीतर जल जीवन मिशन (JJM) के क्रियान्वयन को लेकर कई बड़ी लापरवाही और कमियों को उजागर किया गया है। सीएजी की इस प्रदर्शन समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2024 तक राज्य सरकार द्वारा इस महत्वाकांक्षी योजना पर कुल 11,034.26 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद, ग्रामीण अंचलों में परिवारों को पूरी तरह चालू हालत में घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) देने की राष्ट्रीय रैंकिंग में छत्तीसगढ़ देश के अन्य राज्यों की तुलना में बेहद निचले 23वें पायदान पर सिमट कर रह गया है।

नल कनेक्शन के आंकड़ों में सुधार के बावजूद राष्ट्रीय औसत और रैंकिंग में पिछड़ा छत्तीसगढ़

ऑडिट रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि जब अगस्त 2019 में केंद्र सरकार द्वारा जल जीवन मिशन की शुरुआत की गई थी, तब छत्तीसगढ़ के केवल 3.20 लाख ग्रामीण परिवारों (यानी लगभग 6 प्रतिशत) के पास ही पाइपलाइन के जरिए पानी की सुविधा थी। पिछले पांच वर्षों में काम की रफ्तार बढ़ाते हुए मार्च 2024 तक इस आंकड़े को 38.97 लाख ग्रामीण परिवारों (करीब 78 फीसदी) तक पहुंचाया गया है।

हालांकि, कागजों पर दर्ज इस प्रगति के बाद भी छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय मापदंडों पर उम्मीद के मुताबिक खरा नहीं उतर पाया। इस लचर प्रदर्शन के पीछे मुख्य वजहों को रेखांकित करते हुए महालेखा परीक्षक ने कहा है कि शुरुआती स्तर पर योजना के निर्माण, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को समय पर जमीन पर उतारने, बजटीय आवंटन के वित्तीय प्रबंधन और जमीनी स्तर पर काम की निगरानी (मॉनिटरिंग सिस्टम) में भारी कमियां रहीं, जिसके कारण आम जनता को इसका पूरा लाभ समय पर नहीं मिल सका।

स्वीकृत योजनाओं में भारी सुस्ती: 29 हजार से अधिक एकल जलापूर्ति प्रोजेक्ट्स में से महज 172 काम ही हुए पूरे

सीएजी की इस समीक्षा रिपोर्ट में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की कछुआ चाल को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, पूरे राज्य के लिए जल जीवन मिशन के अंतर्गत कुल 29,153 एकल ग्राम जलापूर्ति योजनाओं को प्रशासनिक मंजूरी दी गई थी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मार्च 2024 की समयसीमा समाप्त होने तक इनमें से केवल 172 योजनाएं ही पूरी तरह से धरातल पर मुकम्मल की जा सकीं।

इतना ही नहीं, प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह रहा कि पूरी हो चुकीं इन मुट्ठी भर योजनाओं में से भी केवल 32 जल परियोजनाओं के दैनिक संचालन और रख-रखाव की जिम्मेदारी स्थानीय ग्राम पंचायतों या ग्रामीण सामुदायिक संस्थाओं को आधिकारिक तौर पर हस्तांतरित की गई, जिससे व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके।

'हर घर जल' के दावों की खुली पोल, जमीनी काम पूरा हुए बिना ही कागजों पर गांवों को घोषित किया प्रमाणित

ग्रामीण विकास से जुड़े इस महाअभियान के तहत गांवों को 'हर घर जल' प्रमाणित करने की रफ्तार भी बेहद निराशाजनक पाई गई है। सीएजी के अनुसार, राज्य सरकार के पास कुल 19,656 ग्रामीण क्षेत्रों को इस श्रेणी में प्रमाणित करने का लक्ष्य तय था, मगर निर्धारित समय सीमा तक इनमें से महज 716 गांव (केवल 3.64 प्रतिशत) ही आधिकारिक रूप से प्रमाणित किए जा सके।

रिपोर्ट में एक बेहद गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ी की ओर इशारा करते हुए साफ कहा गया है कि कई गांवों में जलापूर्ति की बुनियादी पाइपलाइन और टंकियों का निर्माण कार्य अधूरा होने के बावजूद, उन्हें कागजों पर जल्दबाजी में 'हर घर जल' संतृप्त घोषित कर दिया गया, जो नियमों का खुला उल्लंघन है।

कोई भी जिला 100% लक्ष्य हासिल नहीं कर सका, धमतरी टॉप पर तो 15 जिलों में स्थिति चिंताजनक

इस योजना की जिलावार समीक्षा में यह बात सामने आई है कि छत्तीसगढ़ का एक भी जिला या विकासखंड अपने क्षेत्र के शत-प्रतिशत ग्रामीण घरों तक स्वच्छ पेयजल का नल कनेक्शन पहुंचाने के मूल उद्देश्य को हासिल नहीं कर पाया है। अगर जिलों के प्रदर्शन की बात करें तो:

  • धमतरी जिले ने राज्य में सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक 98 प्रतिशत का कवरेज हासिल किया है।

  • बलौदाबाजार जिला इस सूची में काफी पीछे छूटते हुए केवल 76 फीसदी के आंकड़े तक ही पहुंच सका।

  • इसके अलावा, राज्य के 15 जिलों की स्थिति बेहद चिंताजनक पाई गई, जहां जलापूर्ति का कुल कवरेज मात्र 56 प्रतिशत से 74 प्रतिशत के बीच ही अटका रहा।

योजना के खाके (प्लानिंग) में बुनियादी खामियां: शुरुआती दो साल की सुस्ती से 6,400 करोड़ रुपये का फंड नहीं हुआ इस्तेमाल

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में नीतिगत स्तर पर की गई गलतियों का भी विस्तार से ब्योरा दिया है। ऑडिट के अनुसार, जल जीवन मिशन के मार्गदर्शक सिद्धांतों के तहत आवश्यक 'बॉटम-अप प्लानिंग' (यानी गांव स्तर से योजना बनाकर ऊपर तक जाना) की स्पष्ट अनदेखी की गई। प्रशासन ने ग्रामीण स्तर पर कोई ठोस कार्ययोजना तैयार किए बिना ही सीधे जिला स्तरीय योजनाएं तैयार कर दीं, जिसके चलते राज्य स्तर का मास्टर प्लान समय पर नहीं बन सका।

इस नीतिगत सुस्ती और शुरुआती दो वर्षों में हुए अत्यधिक विलंब के कारण छत्तीसगढ़ सरकार केंद्र और राज्य दोनों ही हिस्सों की कुल 6,480.04 करोड़ रुपये की उस भारी-भरकम राशि का उपयोग करने से चूक गई, जो राज्य को विकास कार्यों के लिए मिल सकती थी।

पानी की शुद्धता जांचने वाली प्रयोगशालाएं खुद बीमार: 75 लैब्स में से केवल 4 ही मानकों पर खरीं

इस योजना के तहत आम जनता को मिलने वाले पानी की गुणवत्ता और शुद्धता के परीक्षण की सरकारी व्यवस्था भी बेहद बदहाल स्थिति में पाई गई है। सीएजी की तकनीकी जांच में सामने आया कि:

  • पूरे राज्य में संचालित कुल 75 जल परीक्षण प्रयोगशालाओं (वॉटर टेस्टिंग लैब्स) में से केवल 4 प्रयोगशालाएं ही ऐसी थीं, जो पानी की शुद्धता जांचने के लिए तय सभी 13 अनिवार्य रासायनिक व जैविक मानकों का परीक्षण करने में सक्षम पाई गईं।

  • राज्य की लगभग 37 प्रतिशत लैब्स के पास राष्ट्रीय परीक्षण और अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (NABL) की आवश्यक मान्यता तक नहीं थी।

  • इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में लगाई गई कई सौर ऊर्जा आधारित जलापूर्ति प्रणालियों पर उनकी वास्तविक तकनीकी क्षमता से कहीं अधिक कनेक्शन जोड़ दिए गए। इस ओवरलोडिंग के कारण 28,984 ग्रामीण परिवारों को निर्धारित मानकों के अनुसार पर्याप्त और स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति नहीं हो सकी।

भविष्य के लिए सीएजी की सख्त चेतावनी: कार्यप्रणाली में तुरंत सुधार की जरूरत

सीएजी ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट के निष्कर्ष में सरकार को एक सख्त मशविरा और चेतावनी दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि छत्तीसगढ़ के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने बुनियादी स्तर पर योजनाओं के निर्माण, समयबद्ध वित्तीय प्रबंधन, लटके हुए प्रोजेक्ट्स के क्रियान्वयन की गति और निगरानी तंत्र में तत्काल आमूल-चूल सुधार नहीं किया, तो दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर नागरिक तक हर रोज सुरक्षित, स्वच्छ और नियमित पेयजल पहुंचाने का यह राष्ट्रीय संकल्प पूरी तरह खटाई में पड़ सकता है।

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