कांगो और युगांडा से शुरू हुआ इबोला वायरस का प्रकोप अब पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इसे 'अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' घोषित किए जाने के बाद अब एशियाई देशों में भी इसे लेकर घबराहट बढ़ने लगी है। इस जानलेवा वायरस के बढ़ते असर को देखते हुए नई दिल्ली में 28-31 मई को आयोजित होने वाले हाई-प्रोफाइल 'भारत-अफ्रीका मंच शिखर सम्मेलन' को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है।
हालांकि, विदेश मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में स्थगन के पीछे किसी विशिष्ट चिकित्सा आपातकाल का सीधा नाम नहीं लिया है, लेकिन यह स्पष्ट किया है कि अफ्रीकी महाद्वीप के कई देशों में इबोला के मौजूदा प्रकोप को देखते हुए एहतियातन यह कदम उठाना जरूरी था।
सरकार पूरी तरह अलर्ट; स्वास्थ्य सचिव ने ली उच्च स्तरीय बैठक
दुनिया के कई हिस्सों में इबोला के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारत सरकार पहले से ही अत्यधिक सतर्कता बरत रही है। इसी सिलसिले में बुधवार (20 मई) को केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य सचिवों के साथ एक आपातकालीन समीक्षा बैठक की। इस उच्च स्तरीय बैठक में देश के भीतर वायरस से निपटने की तैयारियों, लॉजिस्टिक्स और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्थाओं का बारीकी से आकलन किया गया।
क्या भारत में आ चुका है इबोला? मंत्रालय ने दिया जवाब
इस वैश्विक हलचल के बीच आम जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या देश में इबोला का कोई मामला सामने आया है?
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कोई सक्रिय मामला नहीं: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने साफ किया है कि भारत में अब तक इबोला संक्रमण का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है।
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तैयारियां पुख्ता: हालांकि, वैश्विक चेतावनियों के मद्देनजर देश के सभी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर निगरानी तथा थर्मल स्क्रीनिंग की प्रक्रिया को कड़ा कर दिया गया है।
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प्रोटोकॉल जारी: संदिग्ध मरीजों को अलग रखने (क्वारंटीन), केस मैनेजमेंट और विशेष लैब टेस्टिंग से जुड़े कड़े दिशा-निर्देश सभी राज्यों को पहले ही भेजे जा चुके हैं। प्रशासन का कहना है कि भारत के पास अतीत में ऐसे गंभीर वायरसों को संभालने का बेहतर अनुभव है, इसलिए पैनिक होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है।
भारत में इबोला का इतिहास: 2014 का इकलौता वाकया
भारत में कभी भी इबोला का कोई स्थानीय या सामुदायिक प्रसार नहीं हुआ है। देश के इतिहास में इसका एकमात्र मामला 10 नवंबर, 2014 को सामने आया था, जब पश्चिम अफ्रीका में यह वायरस चरम पर था। तब लाइबेरिया से लौटे एक 26 वर्षीय भारतीय युवक में हवाई अड्डे पर जांच के दौरान संक्रमण की पुष्टि हुई थी। उसे तुरंत विशेष आइसोलेशन वार्ड में रखकर सफलतापूर्वक ठीक कर लिया गया था, जिससे देश के भीतर संक्रमण फैलने का खतरा टल गया था।
यात्रियों के लिए सरकार की नई गाइडलाइन:
इबोला प्रभावित देशों की यात्रा करके लौटने वाले यात्रियों को भारत आने के अगले 21 दिनों तक अपनी सेहत की कड़ी निगरानी करनी होगी।
यदि इस अवधि में बुखार, अत्यधिक कमजोरी या शरीर में दर्द जैसे लक्षण दिखते हैं, तो उन्हें तुरंत एयरपोर्ट हेल्थ डेस्क या नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र को सूचित करना अनिवार्य है।
कैसे फैलता है इबोला और किन्हें है सबसे ज्यादा खतरा?
इस वायरस से सुरक्षित रहने के लिए इसके फैलने के तरीकों को समझना बेहद जरूरी है:
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शारीरिक तरल पदार्थ: यह वायरस संक्रमित मरीज के सीधे संपर्क में आने या उसके शरीर के तरल पदार्थों (जैसे खून, पसीना, लार, उल्टी या अन्य स्राव) के संपर्क में आने से फैलता है।
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हवा से नहीं फैलता: चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, कोविड-19 की तरह इबोला हवा के जरिए (Airborne) नहीं फैलता। यही वजह है कि संक्रमित व्यक्ति को समय पर आइसोलेट करके इसके फैलाव को रोकना काफी हद तक संभव है।
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हाई-रिस्क ग्रुप: मरीजों की देखभाल करने वाले डॉक्टर, नर्स, अस्पताल के अन्य स्टाफ और पीड़ित के परिजनों को संक्रमण का सबसे अधिक खतरा होता है। अफ्रीका में कई मामलों में पारंपरिक अंतिम संस्कार के दौरान शव को छूने की प्रथा के कारण भी यह तेजी से फैला था। सरकार ने सलाह दी है कि यदि कोई परिचित हाल ही में प्रभावित अफ्रीकी देशों से लौटा है, तो कुछ समय के लिए शारीरिक दूरी बनाए रखना ही सबसे सुरक्षित उपाय है।

