‘उठवा बिहाव’ रिवाज: छत्तीसगढ़ में दूल्हा करता है दुल्हन की शादी का पूरा खर्च वहन

कवर्धा | छत्तीसगढ़ अपनी अनोखी परंपराओं और संस्कृति के लिए प्रसिध्द है. यहां अलग-अलग इलाकों में शादी की भी अनोखी परपंरा है. इन्हीं में से एक परंपरा है, ‘उठवा बिहाव’ जो विशेष रूप से कवर्धा जिले के नेऊर क्षेत्र में रहने वाले बैगा आदिवासी समुदाय के बीच प्रचलित है. आधुनिक युग में भी यह परंपरा सामाजिक एकता और संवेदनशीलता का एक जीवंत प्रमाण है.

छत्तीसगढ़ का अनोखा ‘उठवा बिहाव’

छत्तीसगढ़ अनोखी परंपराओं का घर है, जिनमें से कई का पालन आज भी विभिन्न जनजातीय समुदायों द्वारा किया जाता है. विवाह के दौरान निभाई जाने वाली अनेक रीतियों में से ‘उठवा बिहाव’ परंपरा आधुनिक युग में एक अत्यंत विशिष्ट प्रथा के रूप में उभरकर सामने आती है. 

कैसा होता ‘उठवा बिहाव’?

आज भी कवर्धा के नेऊर क्षेत्र में बैगा आदिवासी समुदाय अपनी विशिष्ट परंपराओं और सामाजिक रीति-रिवाजों के लिए प्रसिद्ध है.इन परंपराओं में से एक अनोखी शादी की प्रथा  उठवा बिहाव के नाम से जानी जाती है, जिसका पालन इस समुदाय में आज भी किया जाता है.मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बैगा समुदाय में आज भी उठवा बिहाव की परंपरा काफी प्रचलित है.इस परंपरा के तहत यदि दुल्हन का परिवार शादी का खर्च उठाने में असमर्थ होता है, तो दूल्हे का परिवार आगे आकर पूरी विवाह रस्म की संपूर्ण जिम्मेदारी उठा लेता है.दूल्हा अपने परिवार और बारात के साथ दुल्हन के घर पहुंचता है, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उसका स्वागत किया जाता है.यहां हल्दी जैसी रस्में निभाई जाती हैं, भोजन परोसा जाता है और इसके बाद दुल्हन की विदाई (विदा) होती है.दूल्हे के घर पहुंचने पर शादी की बाकी रस्में पूरी की जाती हैं.विशेषज्ञों के अनुसार यह परंपरा केवल एक वैवाहिक रीति-रिवाज ही नहीं, बल्कि बैगा समुदाय की सामुदायिक एकता, सहयोग और संवेदनशीलता का प्रतीक है.

Latest news

Related news