जग्गी हत्याकांड में बड़ा ट्विस्ट: हाईकोर्ट का आदेश, अमित जोगी को 3 हफ्ते में करना होगा सरेंडर

Jaggi Murder Case : छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में गुरुवार 2 अप्रैल को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सियासी हलकों में हलचल मचा दी है. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अमित जोगी को तीन हफ्तों के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है. यह फैसला चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने सुनाया है.

Jaggi Murder Case में अमित जोगी पहले हो गये थे बरी 

इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने करीब 11,000 पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश की थी, जिसमें अमित जोगी के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगाए गए थे. हालांकि, इससे पहले अदालत ने उन्हें इस केस में बरी कर दिया था लेकिन अब दोबारा मामले में शामिल करते हुए सरेंडर का आदेश दिया गया है. सुनवाई शुरू होने के कुछ ही देर बाद कोर्ट का यह सख्त आदेश सामने आया, जिससे अमित जोगी की कानूनी मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं.

कैसे हुई रामवतार जग्गी की ह’त्या ?

दरअसल, साल 2003 में राजधानी रायपुर में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के नेता रामावतार जग्गी की दिनदहाड़े गोली मारकर ह’त्या कर दी गई थी. इस सनसनीखेज हत्याकांड में कुल 31 आरोपियों को नामजद किया गया था, जिनमें से दो को सरकारी गवाह बनाया गया था. वर्ष 2007 में 28 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जबकि अमित जोगी को उस समय दोषमुक्त कर दिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में भेजा था मामला 

बाद में इस मामले में अपील और पुनर्विचार की प्रक्रिया चली. दो साल पहले हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने दोषियों की अपील खारिज करते हुए उनकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था. इसके बाद सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेजने के निर्देश दिए, जिसके बाद अब 2 अप्रैल को बिलासपुर हाईकोर्ट में फिर से सुनवाई शुरू हुई.

इस केस में रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने अमित जोगी की दोषमुक्ति को चुनौती देते हुए आपराधिक अपील दायर की थी. उनके वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह हत्या एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी और जांच के दौरान सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी की गई थी. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में केवल प्रत्यक्ष सबूत ही नहीं, बल्कि साजिश की कड़ियों को भी महत्व दिया जाना चाहिए.

रामावतार जग्गी एक कारोबारी होने के साथ-साथ वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे. जब शुक्ल कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में शामिल हुए, तो जग्गी भी उनके साथ चले गए और उन्हें छत्तीसगढ़ में पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया गया था.

इस हत्याकांड में कई प्रभावशाली नाम सामने आए थे, जिनमें प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर राजनीतिक और आपराधिक जगत से जुड़े लोग शामिल थे. अब हाईकोर्ट के इस ताजा आदेश ने एक बार फिर इस पुराने मामले को सुर्खियों में ला दिया है और आने वाले दिनों में इस केस में और बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं.

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